Guru Purnima क्या है? गुरु पूर्णिमा का ऐतिहासिक महत्व क्या है?

Guru Purnima

अखंड मंडलाकाराम् व्याप्तम् येन चराचरम्।

तत पदम् दर्शितम् येन तस्मै श्री गुरुवे नमः।।

Guru Purnima उत्सव भारतीय संस्कृति के महत्वपूर्ण उत्सव में से एक माना गया है। यह पर्व गुरुजनों के प्रति कृतज्ञता, सम्मान व आशीर्वाद प्राप्त करने हेतु एक महत्वपूर्ण अवसर व श्रद्धा अर्पित करने का समय होता है। यह पर्व पूर्ण रूप से आध्यात्मिक एवं अध्यापन कार्य कराने वाले गुरुजनों को समर्पित पर्व है। भारतीय परंपरा में गुरु का स्थान सर्वोच्च माना गया है उन्हें ईश्वर से भी उच्च स्थान पर स्थापित किया गया है।

Guru Purnima क्या है?

गुरु-शिष्य के सम्बन्धों को सशक्त व् भाव प्रकट करने का एक क्षण व् पर्व है, जो वर्ष में केवल एक बार आता है। इस पर्व की प्रतीक्षा सभी शिष्यों को होती है ताकि वे गुरुजनों का हृदयी आभार प्रकट कर सकें। यहां Guru Purnima से तात्पर्य आध्यात्मिक गुरुओं के प्रति श्रद्धा प्रकट करने का समय भी है

Guru Purnima को अनुशासन पर्व भी कहा जाता है।

गुरु पूर्णिमा कब मनाया जाता है??

पुराणों एवं शास्त्रों के अनुसार Guru Purnima प्रत्येक वर्ष आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष में पूर्णिमा के दिन बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है।

Guru Purnima कैसे मनाया जाता है?

आषाढ़ माह माह के शुक्ल पक्ष पूर्णिमा के दिन सभी शिष्य एवं चेले अपने गुरुजनों आध्यात्मिक गुरुजनों को बुलाकर उनका हृदई धन्यवाद ज्ञापित करते हैं। और उनसे आशीर्वाद प्राप्त करते हैं दीक्षा के रूप में यथाशक्ति वे गुरुजनों को भेंट स्वरूप दक्षिणा, साँल, नारियल इत्यादि तिलक लगाकर, भोजन कराकर भेंट अर्पित करते हैं। गुरुजनों के द्वारा भी उन्हें आशीष प्रदान किया जाता है, और भगवान से प्रार्थना करते हैं कि शिष्यों के घर में हमेशा खुशियां रहें इस प्रकार आशीर्वाद संतो के द्वारा लिया जाता है।

Guru Purnima का ऐतिहासिक महत्व क्या है?

वेदों की रचना काल करने वाले गुरुओं के गुरु वेद व्यास जी धरती लोक में सभी गुरुओं में श्रेष्ठ माने गए हैं, उनके सम्मान में गुरु पूजा की परंपरा प्रारंभ की गई परंतु इससे पहले भी महागुरु हुए हैं जो रूद्र के रूप में संपूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त हैं चिरकाल तक यह परंपरा का निर्वहन प्राणियों द्वारा अनवरत जारी है।

इतिहास साक्षी है कि जिन शिष्यों ने अपनी श्रद्धा संयोग से गुरु का निर्माण किया उनको ही चमत्कारी फल मिले।  द्रोणाचार्य कारों के लिए सामान्य वेतन भोगी शिक्षक से अधिक कुछ ना बन सके पांडवों के लिए अजय विद्या के स्रोत बने। एकलव्य के लिए एक अद्भुत चमत्कार बन गए अंतर था श्रद्धा संयोग से बने गुरु का तत्व का रामकृष्ण परमहंस जनसामान्य को बाबाजी से अधिक कुछ लाभ ना दे सके किंतु इसने अपनी श्रद्धा से उन्हें गुरु रूप में विकसित कर लिया उनके लिए अवतार तोले सिद्ध हुए वस्तु शिष्यों को अपनी श्रद्धा तपस्या साधना द्वारा सशक्त गुरु निर्माण का प्रयास जारी रखना चाहिए कमा गुरु पर्व यही अवसर देकर आता है।

संदीपनी गुरु के सानिध्य में ही श्री कृष्ण एवम् सुदामा ने शिक्षा प्राप्त की थी।

मान्यता यह भी है कि प्राचीन समय में शिक्षा गुरुकुल में प्राप्त होती थी वहां रहकर शिष्य सभी प्रकार की शिक्षा प्राप्त करते थे। शिक्षा का उपयुक्त समय वर्षा काल के आसपास ही होता था इस समय तापमान सामान्य होता था शिष्यों के द्वारा गुरु से ज्ञान प्राप्त करने से पूर्व उनकी आराधना पूजा और सम्मान के लिए Guru Purnima पर्व मनाया जाता था और दीक्षा प्राप्त लेने के लिए यथाशक्ति दक्षिणा गुरु को अर्पित की जाती थी।

Guru Purnima

गुरु और शिष्य का संबंध कैसा होता है?

भारतीय संस्कृति में गुरु शिष्य का संबंध दाता भिखारी जैसा नहीं सहयोगी-साझेदारी स्तर का बनाया जाता है। गुरु शिष्य को अपनी दिव्य संपदा की कमाई का एक अंश देता रहता है, जो अनुशासन पूर्वक प्राप्त किया जाकर शिष्य के व्यक्तित्व को ऊंचा उठाता है उठे व्यक्तित्व के द्वारा शिष्य भी अलौकिक पारलौकिक कमाई करता है।

गुरुजनों एवं शिशु का संबंध पिता-पुत्र की तरह होता है

गुरु आज्ञा गरीयसी – शिशुओं के लिए गुरु की आज्ञा ही सर्वोपरि होती है।

अनुचित उचित विचार जे पालन गुरु बैन –

अर्थात गुरु गुरु और माता-पिता की आज्ञा का जो पुत्र शिष्य बिना विचार किए अपनी बुद्धि लगाए बिना उनके आदेश का पालन करता है उनको साक्षात जीतेगी इस संसार में बस हमारा पुत्र अर्थात इंद्रलोक की अमरावती लोक है उसको उनके जीते जी लोक प्राप्त हो जाता है यह है माता पिता गुरु की सेवा करने का फल वही सच्चे सच्चे शिष्य हैं और वही सच्चे मित्र हैं ।

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Guru Purnima का महत्व क्या है:-

Guru Purnima साधु-संतों गुरुजनों शिक्षकों माता पिता एवं उन सभी गुरु के प्रति सम्मान प्रकट करने का पर्व है। गुरु कोई भी हो सकता है उसका सम्मान हमें कृतज्ञ रहने की प्रेरणा प्रदान करता है। मानव जन्म से मिट्टी के समान होता है जिसे कुम्हार के रूप में शिक्षक हमें परिष्कृत करते हैं, और समाज में सम्मान पूर्वक जीवन जीने की दिशा प्रदान करते हैं।

आने वाली समस्याओं से कैसे निपटें दुखों से किस प्रकार बचे और लड़ें दूसरों का हित सोचें सामाजिक बुराइयों से दूर रहें ऐसी शिक्षा सभी गुरुजनों के द्वारा प्रदान की जाती है। समाज को सही दिशा प्रदान करने वाला गुरु ही है, अतः उनका सम्मान करने में संकोच कैसा यही एक पर्व होता है जब हम तन मन और धन से भावपूर्ण गुरुजनों के प्रति श्रद्धा प्रकट करते हैं, यह अत्यंत मार्मिक पर्व है हमें हमेशा गुरुजनों का सम्मान करना चाहिए।

अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः ।

चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्धर्मो यशो बलम्

‘‘जो सदा नम्र सुशील विद्वान् और वृद्धों की सेवा करता है उसका आयु, विद्या, कीत्तिर् और बल ये चार दा बढ़ते’’ ।

Guru Purnima कौन कौन से देशों में मनाया जाता है?

गुरु पूर्णिमा न केवल भारतवर्ष में अपितु संपूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप के समस्त देशों में किसी ना किसी प्रकार से अलग-अलग समय में अलग-अलग नामों से Guru Purnima मनाया जाता है जिनमें प्रमुख देश नेपाल भूटान म्यांमार श्रीलंका पाकिस्तान अफगानिस्तान थाईलैंड आदि शामिल हैं।

Guru Purnima का अन्य सम्प्रदायों में उल्लेख:-

हिंदू धर्म के अलावा Guru Purnima का महत्व अन्य संप्रदायों एवं धर्मों में प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से मनाया जाता है-

सिख सम्प्रदाय में 10 गुरु हुए हैं जिनकी अपना विशिष्ट महत्व है गुरु नानक देव उनमें प्रमुख हैं उनकी आराधना का दिन ही गुरु जी गुरु पूर्णिमा का दिन माना जाता है।

बौद्ध संप्रदाय में बुद्ध पूर्णिमा के दिन को गुरु के लिए समर्पित किया जाता है इसी दिन गौतम बुध का जन्म हुआ था उन्हीं की याद में प्रतिवर्ष यह पर्व मनाया जाता है।

इस्लाम धर्म में अल्लाह की सर्वोच्चता बताने वाले मोहम्मद पैगंबर के जन्म दिवस को गुरु पर्व के रूप में मनाया जाता है जिसे ईद उल मिलाद उन नबी कहते हैं।

ईसाई धर्म में भी ईसा मसीह को ईसाईयों का गुरु माना गया है उनके सच्चे ज्ञान को आदर्श मानकर उनका अनुसरण ईसाई अनुयायियों के द्वारा प्रतिवर्ष 25 दिसंबर को मनाया जाता है।

पारसियों मैं अग्यारी स्थल में गुरु पूजा विस्तृत रूप से की जाती है।

अच्छा सद गुरु कैसा होता है?

एक अच्छा शिक्षक एक मोमबत्ती की तरह होता है, वह खुद प्रज्वलित होकर दूसरों को रास्ता दिखाता है

गुरु दीवो गुरु देवता गुरु बिन घोर अंधकार।

जय गुरु वाणी वेगला रडवडिया संसार।।

जो गुरु की वाणी से दूर हैं वह ख़ाक धनवान हैं। जो गुरु के वचनों से दूर है वह खाक सत्तावान हैं जो गुरु की सेवा से विमुख हैं वे खाक देवता हैं वे तो भोगों के गुलाम हैं। जो गुरु के वचनों से दूर हैं यह क्या खाक अमृत पीते हैं उनको तो पद पद पर राग द्वेष का जहर पीना पड़ता है।

अज्ञान मूल हरण जन्म कर्म निवारकम्।

ज्ञान वैराग्य सिद्धयर्थं गुरुपादोदकं पिबेत्।।

गुरु के चरणों का जल चरणामृत पिए। उनके आदेशों के अनुसार अपने जीवन को ढालें। उनकी चाह में अपनी चाह मिला दें। उनकी निष्ठा में अपनी निष्ठा मिला दें उनकी मस्ती में अपनी हस्ती मिटा दें। आप का कल्याण हो जाएगा।।

गुरु ऐसा मनुष्य होना चाहिए जिसने ज्ञान को जान लिया है और देवसत्य को वास्तव में अनुभव कर लिया है और अपने अपने को आत्मा के रूप में देख लिया है मेरे सामान एक बाजार मूर्ख बातें और बना सकता है पर गुरु नहीं हो सकता।

सबसे अच्छा शिक्षक आपको जवाब नहीं देता है, वे सिर्फ रास्ता तय करते हैं, और आपको अपने स्वयं के विकल्प चुनने देते हैं जिससे आप अपनी सारी खुशी प्राप्त कर सकते हैं।

अच्छा शिक्षक वह है जो बच्चों को प्यार करता है तथा पढ़ाने में उसे आनन्द आता है। उसे औसत विद्यार्थी को अपना प्रदर्शन सुधारने में मदद करनी चाहिए, उसे अपने व्यवसाय को एक लक्ष्य की तरह लेना चाहिए, जिसमें वह किसी विद्यार्थी को केवल पढ़ाता ही नहीं हो बल्कि वह एक समझदार नागरिक पैदा कर रहा हो जो भविष्य में देश में परिवर्तन लाने वाला हो।

Guru Purnima

Guru Purnima में गुरुजनों का पूजन कैसे करें?

यह पर्व पूजन मंच पर ब्रह्मा विष्णु महेश के चित्र अथवा उनके प्रतीक रखने चाहिए यदि एक ही विचारधारा के व्यक्ति एकत्रित हैं तो शरीर धारी गुरु का चित्र भी रख सकते हैं। यदि विभिन्न धाराओं से संबंधित व्यक्ति एकत्र होने वाले हैं तो गुरु का प्रतीक नारियल रख लेना चाहिए।

विशेष पूजन के लिए क्रमशः गुरु का आवाहन एवं ब्रह्मा विष्णु महेश का आवाहन करना चाहिए। गुरु तीनों धाराओं का संगम होता है प्रत्येक आवाहन के लिए के पूर्व उनकी गरिमा का उल्लेख गिने-चुने शब्दों में किया जाए फिर भाव संकेत देते हुए मंत्र उच्चारण पूर्वक आवाहन किया जाए-

गुरु आवाहन:-

गुरु सत्ता जो ईश्वरी सत्ता का ही एक अंश है हमारी प्रार्थना पर अपने आप को प्रकट कर दें ताकि हम उसको समझ सके उपयोग कर सकें हम उनके अनुशासन पालन ने का विश्वास दिलाते हुए उनका भाव भरा आवन करते हैं हाथ में अक्षत पुष्प लेकर गुरु का आवाहन करें-

ॐ आनंद माननंदकरम् प्रसन्नम्, ज्ञान स्वरूपम् निज बोध रूपम्।

योगिंद्र मीड्यम् भवरोग वैद्यम्, श्री सद्गुरुम् नित्यमहम् नमामि।

गुरूर् गुरुतमो धाम, सत्य: सत्य पराक्रम:।

निमिषोअनिमिष: स्त्रग्वी, वाचस्पति रुदारधी:।।

चैतन्यम् शाश्वतम् अम शांतम व्योमातीतम् निरंजनम्।

बिंदु नाद कला तीतम्, तस्मै श्री गुरुवे नमः ॐ श्री गुरुवे नमः

गुरुजनों का ध्यान करें

गुरुब्रह्मा गुरुविर्ष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः ।

गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः।।

ध्यानमूलम् गुरोमूर्ति: पूजा मूलम् गुरो: पदम् ।

मंत्रमूलम् गुरोवाक्यम् मोक्षमूलम् गुरो: कृपा।।

त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बंधुश्च सखा त्वमेव।

त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देव देव।।

ब्रम्हानन्दनं परमसुखदम् केवलं ज्ञानमूर्तिम्।

द्वंद्वातीतिम् गगन सदृशं तत्वमस्यादि लक्ष्यम्।।

एकम् नित्यम् विमलमचलम् सर्वधीसाक्षीभूतं।

भावातीतम् त्रिगुण रहितम् सद्गुरुम् तं नमामि।।

ब्रह्मा सभी के इष्ट गुरु हैं अतः उनका स्मरण अत्यंत महत्वपूर्ण होता है उनका ध्यान करके ब्रह्मा का आवाहन करें-

ब्रम्हा आवाहन :-

ॐ चतुर्मुखाए विद्महे, हंसारू धाय धीमहि।

तन्नो ब्रम्हा प्रचोदयात् ॐ श्री ब्रम्हणे नमः।।

गुरु द्वारा प्रदत्त तथा पुरुषार्थ द्वारा जागृत सत् तत्वों, सद् आकांक्षाओं परंपराओं के पोषण विकास के लिए पालनकर्ता विष्णु का आवाहन कर करें-

विष्णु जी का आवाहन:-

ॐ नारायणाय विद्महे, वासुदेवाय धीमहि।

तन्नो विष्णु: प्रचोदयात्।। ॐ श्री विष्णवे नमः।।

रूद्र के रूप में शिवजी कल्याणकारी परिवर्तन चक्र के अधिष्ठाता है वह प्रमुख धारा को पलट कर उत्कृष्ट की दिशा को प्रदान करने वाले हैं और वही परम गुरु है अतः उनका ध्यान आवश्यक है-

ॐ तत्पुरुषाय विद्महे, महादेवाय धीमहि।

तन्नो रूद्र: प्रचोदयात् ।।ॐ श्री शिवाय नमः।।

महर्षि व्यास विद्युत प्रतिभा को आदर्श उन्मुख बनाने की प्रबल चेतना के रूप में अवतरित हुए हैं उनके प्रभाव से ही प्रतिभा मनीषा का भटकाव रुक सकता है कल्याण के मार्ग भी होते हैं अतः उनका आवाहन करना चाहिए-

व्यास जी का आवाहन-

ॐ व्यास व्यास करम् वंदे, मुनिम् नारायणस्वयम्।

यत: प्राप्त- कृपा लोका, लोकामुक्ता: कलि गृहात्।।

नमः सर्व विदे तस्मै, व्यासाय कविवेधसे।

चक्रे पुण्यं सरस्वत्या, योर वर्षमिव भारतम्।।

।।ॐ श्री व्यासाय नमः।।

इस प्रकार आवाहन के बाद पुरुष सूक्त से सतगुरु विग्रह का पूजन किया जाए

ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॥ पुरुषसूक्त ॥ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ

ॐ सहस्र शीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्र पात्।
स भूमिम् सर्वत स्पृत्वा ऽत्यतिष्ठद् दशांगुलम्॥1॥
पुरुषऽ एव इदम् सर्वम् यद भूतम् यच्च भाव्यम्।
उत अमृत त्वस्य ईशानो यद् अन्नेन अतिरोहति॥2॥
एतावानस्य महिमातो ज्यायान्श्र्च पुरुषः।
पादोस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्य अमृतम् दिवि॥3॥
त्रिपाद् उर्ध्व उदैत् पुरूषः पादोस्य इहा भवत् पुनः।
ततो विष्वङ् व्यक्रामत् साशनानशनेऽ अभि॥4॥
ततो विराड् अजायत विराजोऽ अधि पुरुषः।
स जातोऽ अत्यरिच्यत पश्चाद् भूमिम् अथो पुरः॥5॥
तस्मात् यज्ञात् सर्वहुतः सम्भृतम् पृषदाज्यम्।
पशूँस्ताँश् चक्रे वायव्यान् आरण्या ग्राम्याश्च ये॥6॥
तस्मात् यज्ञात् सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे॥
छन्दाँसि जज्ञिरे तस्मात् यजुस तस्माद् अजायत117॥
तस्मात् अश्वाऽ अजायन्त ये के चोभयादतः।
गावो ह जज्ञिरे तस्मात् तस्मात् जाता अजावयः॥8॥

तम् यज्ञम् बर्हिषि प्रौक्षन् पुरुषम् जातम अग्रतः।
तेन देवाऽ अयजन्त साध्याऽ ऋषयश्च ये॥9॥
यत् पुरुषम् व्यदधुः कतिधा व्यकल्पयन्॥
मुखम् किमस्य आसीत् किम् बाहू किम् ऊरू पादाऽ उच्येते॥10॥
ब्राह्मणो ऽस्य मुखम् आसीद् बाहू राजन्यः कृतः।
ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्याँ शूद्रो अजायत॥11॥
चन्द्रमा मनसो जातः चक्षोः सूर्यो अजायत।
श्रोत्राद् वायुश्च प्राणश्च मुखाद् ऽग्निर अजायत॥12॥
नाभ्याऽ आसीद् अन्तरिक्षम् शीर्ष्णो द्यौः सम-वर्तत।
पद्भ्याम् भूमिर दिशः श्रोत्रात् तथा लोकान्ऽ अकल्पयन्॥13॥
यत् पुरुषेण हविषा देवा यज्ञम् ऽतन्वत।
वसन्तो अस्य आसीद् आज्यम् ग्रीष्मऽ इध्मः शरद्धविः॥14॥
सप्तास्या आसन् परिधय त्रिः सप्त समिधः कृताः।
देवा यद् यज्ञम् तन्वानाः अबध्नन् पुरुषम् पशुम्॥15॥
यज्ञेन यज्ञम ऽयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्य आसन्।
ते ह नाकम् महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः॥16॥

पूजन के बाद पर्व प्रसाद संकल्प धारण करें-

संकल्प:-

ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः अद्यैतस्य (रात में : अस्यां रात्रौ कहें) मासानाम् मासोतमे मासे ………. २ मासे ………… ३ पक्षे ………… ४ तिथौ …………५ वासरे ………… ६ त्रोत्पन्नः ………… ७ शर्माऽहं/(वर्माऽहं/गुप्तोऽहं/दासोऽहं ) ममात्मनः सपरिवारस्य सर्वारिष्ट निरसन पूर्वक सर्वपाप क्षयार्थं, दीर्घायु शरीरारोग्य कामनया धन-धान्य-बल-पुष्टि-कीर्ति-यश लाभार्थं, श्रुति स्मृति पुराणतन्त्रोक्त फल प्राप्तयर्थं, सकल मनोरथ सिध्यर्थं ..नामाहं अद्य गुरु पूर्णिमा पर्वणि गुरु रूपेण मार्गदर्शन सहयोग दातृ ईश्वरी सत्तायाश्च – दिव्यानुशासनम् अद्य प्रभृति पर्यन्तम् परिपालनस्य श्रद्धा पूर्वकम् संकल्पम् अहम् करिष्ये।

अंत में हाथ जोड़कर प्रार्थना करें:-

बंदउँ गुरु पद पदुम परागा।

सुरुचि सुबास सरस अनुरागा।।

श्री गुरु पद नख मनि गन जोती।

सुमिरत दिव्य दृष्टि हीयँ होती।।

गुरु पद रज मृदु मंजुल अंजन।

नयन अमिअ दृग दोष बिभंजन।।

गुरु बिन भव निधि तरई न कोई।

जौं बिरंचि संकर सम होई।।

 

Guru Purnima की वर्तमान प्रासंगिकता:-

भारतवर्ष में गुरु का स्थान सर्वोच्च रहा है परंतु पाश्चात्य करण के द्वारा गुरु के पद को अन्य व्यवसायिक पदों के भाँति मान लिया गया है। जब से शिक्षा का व्यवसायीकरण हुआ तब से भारत में शिक्षा का स्तर सिमट कर रह गया। गुरुकुल पद्धति नष्ट हो गई गुरु और शिष्य के बीच केवल औपचारिक संबंध रह गए। आज भोग वादी व्यवस्था ने हमें सीमित कर दिया है।

आवश्यकता इस बात की है की यह परिवर्तन कितना मानव के लिए हितकारी है। आज समाज में जितने भी विसंगतियां हैं उसका कारण कहीं न कहीं शिक्षा की अव्यवस्था ही है। यहां की शिक्षा व्यवस्था से केवल शिक्षित व्यक्ति ही पैदा हो सकते हैं ज्ञानी नहीं। मैकाले की शिक्षा व्यवस्था ने भारतीय शिक्षा प्रणाली को सर्वाधिक आधात पहुंचाया। इसे दूर करने का समय आ गया है गुरु पूर्णिमा के माध्यम से पुनः प्राचीन शिक्षा व्यवस्था को वर्तमान में लाने की प्रेरणा हमें मिल रही है। हम इसे सहर्ष स्वीकार करें। तभी हमारा भारत देश विश्व गुरु की ओर अग्रसर हो सकेगा।

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