भगवान jagannath मंदिर और Rath Yatra से जुड़ी सम्पूर्ण जानकारी।

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आज इस लेख के माध्यम से हम आपको भगवान् jagannath मंदिर से जुड़ी  हर जानकारी और इनकी rath यात्रा से भी जुडी हर रोचक  और तथ्य आप तक पहुचायेंगे।हम आशा करते है की आपको यह लेख जरूर पसंद आएगा, तो चलिए आगे बढ़ते है।

भगवान जगन्नाथ।

विष्णु के चार धामों में jagannath पूरी प्रमुख धाम है, जगन्नाथ पुरी भारत के पूर्व में स्थित समुद्र के समीप विद्यमान हैं, यहां भगवान विष्णु साक्षात जगन्नाथ के रूप में निवास करते हैं। वे सर्वशक्तिमान हैं। समस्त प्राणियों के पितानाथ ! जय जगन्नाथ जी की।  मंदिर परिसर में प्रवेश करते ही अंतरात्मा में भक्ति रस प्रवाहित होने लगता है, मन भावविभोर हो जाता है नेत्र खुशी से झलक जाते हैं।

jagannath मंदिर में ऐसा माना गया है कि 33 कोटी देवी देवता वहां निवासरत हैं। मंदिर के चारों दिशाओं में द्वार विशाल रूप से विद्यमान हैं। पूर्व दिशा में स्थित द्वार सिंह द्वार कहलाता है। सिंह द्वार से ही प्रत्येक वर्ष विशाल रथ यात्रा निकलती है। द्वार के दोनों और ऊपर में कृष्ण भगवान एवं बलराम जी की मूर्ति सुशोभित है इसके पास ही कोर्णाक से मंगवाया गया अरुण स्तंभ स्थापित किया गया है।

ऊपर अरुण की मूर्ति स्थित है मंदिर के ऊपर स्थित ध्वजा नील छत्र कहलाता है, jagannath भगवान जी के प्रसाद की भी महिमा भी अत्यंत ही महान है महाप्रसाद में छुआछूत व भेदभाव नहीं किया जाता, श्री जगन्नाथ का मंदिर चारों दिशाओं में द्रव्यमान ज्योति की तरह है , जो रत्नागिरी में स्थित है।

भगवान jagannath की मूर्ति का जिस समय श्रृंगार होता है, उस समय मंदिर के पट बंद रहते हैं। मंदिर से थोड़ी ही दूरी पर स्थित श्री सीताराम बाबा मठ स्थित है यहां प्रभु बाबाजी के भक्ति में लीन अनेक श्रद्धालु पूजा अर्चना करते हैं। भगवान जगन्नाथ की यात्रा संपूर्ण भारतवर्ष में प्रसिद्ध है। आषाढ़ शुक्ल पक्ष के समय यह यात्रा निकाली जाती है, रथ यात्रा निकालते समय मार्ग में स्थानीय राजा के द्वारा झाड़ू भी लगाई जाती है, लाखों श्रद्धालु अपने महाप्रभु के दर्शनार्थ उपस्थित रहते हैं और यात्रा में सहयोग प्रदान करते हैं।

इस रथयात्रा को गुंडीचा यात्रा भी कहा जाता है। क्योंकि यह jagannath रथ यात्रा मंदिर से शुरू होकर गुंडीचा मंदिर तक होकर जाता है। संपूर्ण उड़ीसा को भगवान जगन्नाथ की भूमि कहा जाता है। यहां के निवासी भगवान जगन्नाथ जी को अपने परिवार का एक हिस्सा मानते हैं और कोई भी कार्य शुरू करने से पहले उनकी आराधना अवश्य करते हैं। क्षेत्र को पुरुषोत्तम क्षेत्र भी कहा जाता है।

दक्षिण के द्वार को अश्व द्वार कहा जाता है, उत्तर दिशा के द्वार को हस्थी द्वार कहा जाता है, पश्चिम में स्थित द्वार को त्याग द्वार कहा जाता है, इस मंदिर को स्थापत्य कला का श्रेष्ठ धारण कहा जाता है। इसमें प्राचीन काल के मंदिर निर्माण के अवशेष दिखाई देते हैं, मंदिर के पास ही शिविर का स्थापना किया गया है। ऐसी मान्यता है कि प्राचीन समय में स्थित मंदिर के अवशेषों में ही कलिंग राजा अनंत चोल बर्मन ने 12वीं शताब्दी में इस मंदिर का निर्माण करवाया था।

बहुदा यात्रा:-

जगन्नाथ Rath Yatra पर्व का यह महत्वपूर्ण चरण है। यह एकादशी तिथि के दिन jagannath भगवान लगभग 4 माह के लिए अपने निंद्रा में लीन हो जाते हैं, इससे पहले उन्हें मुख्य मंदिर में वापस आना होता है अतः जगन्नाथ रथ यात्रा के आठवें दिन के पश्चात जब दशमी तिथि पर मुख्य द्वार पर लौटने के लिए जो यात्रा की जाती है वह बहुदा यात्रा के नाम से प्रचलित है। यह यात्रा भगवान के अर्धासिनी घर में एक छोटा सा ठहराव हेतु किया जाता है मां अर्धासनी देवी के भव्य मंदिर को मौसी मंदिर के नाम से भी जानते हैं।

स्नान यात्रा:-

jagannath भगवान की Rath Yatra एवम् बहुदा यात्रा से पहले एक और महत्वपूर्ण यात्रा होती है जिसे स्नान यात्रा के नाम से जाना जाता है। यह अत्यंत प्रेरक होता है; जगन्नाथ भगवान की Rath Yatra के दौरान अनुष्ठान किया जाता है और तैयारी पहले से की जाती है। लगभग 18 दिन पहले भगवान जगन्नाथ, भ्राता बलभद्र और बहन सुभद्रा को स्नान कराया जाता है।

इसी कारण इसे स्नान यात्रा भी कहा जाता है। भगवान जी को स्नान कराने के लिए जगन्नाथ मंदिर में ही स्थित एक पवित्र कुआं है इस कुएं के शुद्ध जल से 108 बर्तनों में जल भरकर भगवान जी को स्नान कराया जाता है।

जगन्नाथ भगवान ठंडे जल से स्नान करने के कारण बीमार हो जाते हैं और 15 दिनों तक बीमार होने के कारण भक्तों को दर्शन नहीं दे देते हैं। इस अवधि को हम अना सारा के नाम से जाना जाता है।  इसे हम क्वारंटाइन के नाम से भी जानते हैं। इसके बाद ही भगवान के दर्शन हो पाते हैं इस दर्शन को हम नव यौवन दर्शन या नेत्रों दर्शन नेत्रोंत्सव् कहा जाता है।

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भगवान jagannath जी की रथ यात्रा क्यों निकाली जाती है?

वेदों एवं पुराणों के अनुसार पूरी भगवान jagannath का धरती में स्थित वैकुंठ निवास है। पुराणों में प्रमुख ब्रह्म एवं स्कंध पुराणों में यह व्याख्या की गई है कि पूरी में भगवान विष्णु जी ने नीलमाधव का अवतार लिया था और वहां पर सबर जनजाति के वे परम पूज्य भगवान बन गए थे। यह जनजाति के भगवान होने के कारण भगवान jagannath कबीलाई देवताओं एवं भगवान की तरह हैं। यह मंदिर की महिमा संपूर्ण विश्व में व्याप्त है। लाखों विदेशी इस रथयात्रा को देखने प्रतिवर्ष आते हैं।

प्रतिवर्ष भगवान jagannath जी को गर्भ गृह से बाहर निकाल कर उनकी रथयात्रा कराई जाती हैं। यह बड़ा ही पवित्र माना जाता है यह रथयात्रा इसलिए किया जाता है कि इससे जनता के समस्याओं एवं सुख दुख को भगवान स्वयं देखते हैं और दूर करने का प्रयास करते हैं। जगन्नाथ पुरी की रथयात्रा में तीन अलग-अलग रथों का निर्माण किया जाता है; जिसमें बलराम जी, श्री कृष्ण भगवान और उनकी बहन देवी सुभद्रा के लिए रथ का निर्माण होता है।

सबसे पहले Rath Yatra के दौरान बलराम जी का रथ निकलता है। उसके बाद सुभद्रा देवी जी का रथ होता है और सबसे पीछे में भगवान जगन्नाथ अर्थात श्री कृष्ण का रथ होता है। रथों को पहचानने के लिए रंगों और ऊंचाइयों का सहारा लिया जाता है यह ओडिशा के पुरी में स्थित जगन्नाथ मंदिर हिंदुओं के आस्थाओं का प्रमुख केंद्र है और यह पवित्र धाम अत्यंत ही पुराना माना गया है।

रथ यात्रा के दौरान निकलने वाले तीन रथो की ऊंचाइयों पर ध्यान दिया जाए तो बलराम जी का जो ताल ध्वज है औरत वह 45 फीट तक होता है बहन देवी सुभद्रा जी का दर्प दलन रथ नामक रथ लगभग 44.6 फीट ऊंचा होता है। भगवान जगन्नाथ जी का रथ इसे नंदीघोष कहा जाता है लगभग स 45.6 फीट जो सर्वाधिक ऊंचा रथ होता है।

भगवान jagannath मंदिर एवं रथ यात्रा से जुड़े अनेक रहस्यात्मक तथ्य निम्न हैं-

  • मंदिर के सर्वोच्च शिखर पर एक सुदर्शन चक्र स्थापित है इस तरह हमें दिखेगा जिस दिशा से आप देखेंगे आपको ऐसा प्रतीत होगा कि यह चक्र का मुख आपके सामने है।

 

  • भगवान jagannath जी के प्रसाद की महिमा तो सभी जानते हैं इसे तैयार करने के लिए एक साथ विभिन्न बर्तन एक दूसरे के ऊपर स्थापित किए जाते हैं, और यह प्रसाद मिट्टी के बने हुए बर्तनों में लकड़ी पर ही तैयार किया जाता है। इसमें आश्चर्य वाली बात यह है कि जो सबसे ऊपर  रखा पकवान सबसे पहले पक कर तैयार हो जाता है। और एक के बाद एक ऐसे ही पकता है और अंत में जो सबसे नीचे होता है वही पकता है।

 

  • सिंह द्वार में मंदिर के प्रवेश की समय समुद्र की लहरों की आवाजों का आना स्वत: ही बंद हो जाता है। जब दरवाजे से जैसे ही बाहर निकलते हैं समुद्र की लहरें सुनाई देने लगती हैं। यह संध्या के समय और भी रोचक हो जाता है।

 

  • मंदिर की ध्वजा से ऊपर कभी कोई पक्षी या चिड़िया या अन्य उड़ते हुए जीव दिखाई नहीं देते यहां से हवाई जहाज भी ऊपर से नहीं निकलते हैं यह आश्चर्य की बात है।

 

  • यहां एक और रहस्य वाली बात यह है कि दिन के समय मंदिर के शिखर की परछाई नहीं दिखाई देती।

 

  • भगवान jagannath मंदिर का प्रसाद कभी भी कम नहीं पड़ता और जैसे ही मंदिर के द्वार बंद होते हैं वैसे ही प्रसाद खत्म भी हो जाते है जगन्नाथ मंदिर लगभग 45 मंजिला है शिखर पर स्थित ध्वज प्रतिदिन मंदिर के पुरोहितों एवं पंडितों द्वारा बदला जाता है ऐसी मान्यता है कि अगर एक भी दिन ध्वजा नहीं बदला गया; तो यह मंदिर अपने आप 18 वर्षो के लिए बंद हो सकता है।

 

  • यहां जल समीर वह स्थल समीर के सिद्धांत विपरीत दिखाई देते हैं अर्थात समुद्र की ओर बहने वाली हवा जो दिन में चलती है व रात के समय धरती से समुद्र की ओर चलती है हवा जगन्नाथ मंदिर के स्थान पर ठीक उल्टी प्रक्रिया होती है जो एक अत्यंत आश्चर्य का विषय है।

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jagannath रथ यात्रा की आधुनिक मान्यता क्या है?

वैसे तो अनेक मान्यताएं और परंपराएं जगन्नाथ रथ यात्रा से जुड़ी हुई हैं;परंतु एक महत्वपूर्ण कहानी के विषय में चर्चा करें तो एक समय कलिंग राज्य के प्रसिद्ध राजा हुए जिनका नाम था राम चंद्र देव। इन्होंने एक यवन कन्या से विवाह किया और इस्लाम धर्म को अपना लिया। उनके इस कृत्य से जनता बहुत दुखी हुई और उनको मंदिर में प्रवेश से प्रतिबंधित कर दिया गया। रामचंद्र देव भगवान की के दर्शन करना चाहते थे और वह सभी से प्रार्थना किए कि उनकी रथयात्रा निकाली जाए। इस प्रकार रथ यात्रा उनके कहने से प्रारंभ हुई और जो वर्तमान में भी सतत रूप से जारी है।

Rath Yatra के लिए रथों का निर्माण कब से प्रारंभ होता है?

भगवान jagannath महाराजाधिराज जी की रथ यात्रा बड़े ही धूमधाम व अनुष्ठानों के द्वारा संपन्न होता है। इसका निर्माण अक्षय तृतीया के दिन गणेश पूजन के साथ पवित्र तिथि से प्रारंभ होता है। यह निर्माण प्रक्रिया लगभग माहभर की होती है और इसके साथ यह भव्य दिव्य एवं आकर्षक रथ बनकर तैयार होते हैं।

jagannath भगवान की रथ यात्रा में अलग अलग रथों का क्या नाम होता है?

पुरी की जगन्नाथ रथ यात्रा में जिन रथों का प्रयोग किया जाता है उनके अलौकिक नाम भी होते हैं जो इस प्रकार हैं

1. गरुड़ध्वज या कपिलध्वज :-

तीनों रथों में सबसे महत्वपूर्ण रथ गरुड़ध्वज का होता है क्योंकि इसमें भगवान जगन्नाथ जी स्थापित होते हैं। यह रथ 16 पहियों वाला होता है। इसकी ऊंचाई की बात करें तो 13.5 मीटर होती है। रथ लाल और पीले वस्त्रों से सुशोभित होता है। इस रथ का नाम गरुड़ध्वज इसलिए भी पड़ा क्योंकि इसकी रक्षा विष्णु भगवान के वाहक गरुण होते हैं और वही इस रथ की सुरक्षा करते हैं।

2. तलध्वज रथ:-

यह रथ बलराम जी के लिए बनाया जाता है जो 13.2 मीटर ऊंचा और 14 पहियों वाला होता है इसका अलंकरण लाल हरे वह लकड़ियों के 763 टुकड़ों से निर्मित होता है। इस रथ के रक्षक वासुदेव और सारथी मिताली मिलकर करते हैं रथ के ऊपर जो ध्वज होता है उसे उनानी कहा जाता है। घोरा, त्रिब्रा, स्वर्ण नावा दीर्पशर्मा प्रमुख घोड़े होते हैं रथ को खींचने के लिए जिस रस्सी का प्रयोग किया जाता है उसे बासुकी कहते हैं।

3. पद्मध्वज रथ:-

पद्मन ध्वज रथ भगवान jagannath की बहन सुभद्रा के लिए होता है, यह 12.9 मीटर की ऊंचाई का होता है इसमें 12 से अधिक पहिये होते हैं इसमें भी लाल वह काले कपड़े का प्रयोग किया जाता है, 593 विभिन्न लकड़ी के टुकड़ों का प्रयोग होता है । सुभद्रा जी के रत्नों की रक्षा जय दुर्गा व सारथी अर्जुन द्वारा किया जाता है। इस रथ में जो शीर्ष में ध्वज होता है उसे नंदबिक कहा जाता है। इसके अश्व जिता, अपराजिता, मोचिक व् रोचिक होते हैं। पद्मध्वज रथ को खींचने के लिए स्वर्णाचूड़ा नामक रस्सी का प्रयोग किया जाता है।

यह रथ यात्रा प्रतिवर्ष शुक्ल पक्ष की द्वितीया को निकाली जाती है यह बहुत बड़ा समारोह होता है और इस यात्रा को परम मोक्ष की प्राप्ति है के उद्देश्य से अनेक लाखो भक्त इस महान जगन्नाथ पुरी धाम में आकर इस भव्य अभिषेक में शामिल होते हैं। यह यात्रा गुंडिचा मंदिर पहुंचकर ही पूर्ण होती हैं भगवान जगन्नाथ पुरी का वर्णन पद्म पुराण ब्रह्म पुराण नारद पुराण स्कंद पुराण आदि में विस्तार से मिलता है।

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jagannath मंदिर की मूर्तियों की उत्पत्ति कैसे हुई?

भगवान जगन्नाथ जी का मंदिर विष्णु जी को समर्पित है यहां भगवान विष्णु जी की पूजा बड़ी धूमधाम से की जाती है। जगन्नाथ की मंदिर में जो मूर्तियां स्थापित है उनकी उत्पत्ति के विषय में अनेक मान्यताएं वह पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं जिनमें से 2 कथाएँ सर्वाधिक मान्य हैं

पहली कथा के अनुसार ऐसी मान्यता है कि श्री कृष्ण अपने भक्त राजा इन्द्रद्युम जी के स्वप्न में आकर उन्हें निर्देशित किया कि समुद्र किनारे पुरी के पास एक बहुत विशालकाय बड़ा पेड़ है, उस पेड़ के तने में भगवान श्री कृष्ण का भव्य विग्रह बनाने के लिए आदेशित करिए राजा सुबह उठ कर भगवान का आदेश मानकर एक विश्वकर्मा बढ़ई की तलाश करना चालू कर दिया। कुछ दिनों बाद एक जर्जर शरीर वाला परंतु आकर्षक एक वृद्ध ब्राह्मण वहां पास आया और कहने लगा कि वह भगवान जी के विग्रह को बनाने के लिए तैयार है, उसने एक शर्त भी राजा के पास रखी।

उसने कहा कि वह विग्रह बंद कमरे में ही बनाएगा और तब तक उस कमरे में कोई ना आए जब तक वह नहीं खुलेगा द्वार अन्यथा भगवान जी के विक्रम को बनाने का काम अधूरा हो जाएगा। लगातार 1 सप्ताह तक ब्राह्मणी अथक परिश्रम कर विक्रण बनाने का काम प्रारंभ किया सातवें दिन कमरे से आवाज आनी बंद हो गई तो राजा से उत्सव खोकर दरवाजे का को खोलने का आदेश दिया।

क्योंकि वह राजा सोच रहा था कि कहीं रख ब्राह्मण को कुछ समस्या ना हो गई हो। जब द्वार खोला तब अंदर सिर्फ भगवान का अधूरा विग्रह ही बन पाया था। ब्राह्मण जो था वह लुप्त हो चुका था। तब राजा जी को एहसास हुआ कि वह जो ब्राह्मण कोई और नहीं भगवान विश्वकर्मा जी थे। राजा को इस बात का बहुत दुख हुआ क्योंकि विग्रह के हाथ पैर नहीं बने थे।

वह अत्यंत दुखी महसूस कर रहा था कि द्वार को क्यों खोला? इसी समय एक ब्राम्हण रूप नाराज जी आ पहुंचे और राजा से कहने लगे कि भगवान ऐसे ही और चरित्र अवतार लेना चाहते थे इसीलिए कृष्ण भगवान ने राजा के मन को भ्रमित कर दिए थे। नारद ने यह कहा कि पश्चाताप आप ना करें यह भगवान का ही आदेश था उन्हीं के द्वारा यह सब किया गया। इस तरह मंदिर में ऐसे विग्रह मूर्तियों का निर्माण हुआ जो कास्ट से बने हुए हैं।

दूसरी कथा – महाभारत काल के समय की है, यह jagannath मंदिर में विराजे जगन्नाथ जी की मूर्ति के ऐसे स्वरूप का रहस्य क्या है? इसकी जानकारी हमें मिलती है एक समय मा यशोदा सुभद्रा एवं देवकी जी भ्रमण करते हुए वृंदावन से द्वारका की ओर आए वहां पर अनेक रानियों ने उनसे प्रार्थना है की।

रानियां कहने लगी कि श्री कृष्ण गोपाल की बाल कलाओं के बारे में हम जानना चाहते हैं इसे बताइए। यशोदा और देवकी माताओं के द्वारा कृष्ण जी की बाल लीलाओं की कहानियां सुनाई जाने लगी। इसी समय कृष्ण जी की बहन सुभद्रा जी ने द्वार पर खड़े होकर पहरेदारी की और उन्हें निर्देश दिया गया कि जब कृष्ण और बलराम जी आएंगे तो सूचित कर दीजिएगा।

सुभद्रा श्री कृष्ण जी की कहानी सुनने में मग्न हो गई और इतनी मग्न हो गई कि श्री कृष्ण और बलराम के आने के बाद भी उन्हें आभास ना रहा। उस समय दोनों भाइयों कृष्ण और बलराम ने पूरी कहानी सुनी और उन्हें बहुत प्रसन्नता हुई। कृष्ण भगवान और बलराम जी के बाल खड़े हो गए बड़ी बड़ी आंखें हो गई उनके ओठ बहुत बड़े और विस्मयादिबोधक जैसे हो गए।

उनके शरीर में प्रेमा भाव उत्पन्न हो गया सुभद्रा बहन भी बहुत ज्यादा भावविभोर हो गई थी इसलिए आनंद स्वरूप उनका शरीर अत्यंत ही ज्यादा हर्षित होकर पिघल कर छोटा दिखाई देने लगा। इसीलिए ऐसी मान्यता है कि जगन्नाथ मंदिर में सबसे छोटी मूर्ति सुभद्रा जी की ही है।

इसी समय वहां नाराज जी आप पहुंचे और और श्री कृष्ण भगवान से कहने लगे कि आप अत्यंत ही सुंदर दिखाई दे रहे हैं क्या ऐसे ही रूप में आप जन्म देना चाह रहे हैं? तब भगवान श्रीकृष्ण भगवान ने कहा कि कलयुग आने वाला है तो वह वहां ऐसे ही अवतार लेंगे और कलयुग में राजा इंद्रद्युम्न को माध्य बनाकर अवतार होगा।

ऐसी मान्यता है कि श्री कृष्ण भगवान के समाधि ग्रहण करने के बाद जब उनके पार्थिव शरीर को द्वारिका क्षेत्र में लाया जाता है तब इस परिस्थिति को देखकर बड़े भाई बलराम अपने भाई की मृत्यु को देखकर दारुण करने लगते हैं और श्री कृष्ण भगवान के पार्थिव शरीर को साथ लेकर समुद्र में जाकर पूजने जाते हैं उनके पीछे-पीछे सुभद्रा भी कूद जाती है।

पुरानी चारण परंपरा के अनुसार यह मान्यता है कि भगवान द्वारकाधीश श्री कृष्ण भगवान के अध जले हुए शरीर को यहां लाकर प्राची में प्राण त्याग करने के पश्चात यही समुद्र किनारे अग्नि दा संस्कार कृष्ण भगवान जी बलराम वह सुभद्रा तीनों का किया गया था। उसी समय कहा जाता है कि समुद्र में बहुत बड़ा तूफान आया था और आज जले हुए शरीर को वह आकर समुद्र ले गया था।

वह शरीर अधिक जले हुए पुरी के समीप प्राप्त हुए। ऐसा माना जाता है पूरी के राजा ने तीनों शवों को अलग-अलग रथों में रख कर ले गए थे। भगवान जी के दर्शन के लिए संपूर्ण पूरी क्षेत्र में जनता के सामने घुमाया गया और अंत में इन्हें धरती माता को समर्पित कर दिया गया। हम आज भी यह परंपरा को देख सकते हैं।

इसे उशी परंपरा कहा जाता है यह तथ्य बहुत कम लोग जानते हैं ऐसा माना जाता है भगवान आज भी जिंदा है और यहां आते हैं। अनेक लेखों में इसका वर्णन हमें प्राप्त होता है।

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भगवान jagannath जी के मंदिर का उद्गम कैसे हुआ?

1000 वर्षों से लगभग कलिंग क्षेत्र में गंग वंश के शासकों का राज्य रहा यहां अनेक ताम्रपत्र खोजे गए। आज हम जो जगन्नाथ मंदिर पुरी में जो स्थित है उसे देख रहे हैं उसका उस मंदिर का निर्माण गंग वंश के शासक अनंतवर्मन चोडगंग देव द्वारा प्रारंभ किया गया था। अधिकांश मंदिर का भाग का निर्माण इन्हीं के द्वारा किया गया था मंदिर के जगमोहन एवं जो शिखर क्षेत्र में स्थित है विमान भाग है वह इन्हीं के शासन में बना था।

इसके बाद 1179 में उड़ीसा के एक प्रसिद्ध शासक अनंग भीमदेव द्वारा वर्तमान मंदिर को पूर्ण रूप दिया गया। मंदिर में पूजा अर्चना लगभग 1558 तक सतत रूप से जारी रही। इसी बीच अफगान के एक जनरल काला पहाड़ द्वारा ओडिशा में आक्रमण कर दिया जाता है और पूरी में स्थित मंदिर की मूर्तियां और मंदिर को पूरी तरह ध्वस्त करने का प्रयास किया जाता है।

मन्दिर में पूजा बिल्कुल से बंद करा दी जाती है। विग्रह को छिपाकर चिल्का झील के एक द्वीप में दिया जाता है। कालांतर में राम चंद्र देव के खुर्दा में एक स्वतंत्र एवं संप्रभु राज्य की स्थापना की जाती है और मंदिर वह उसकी मूर्ति को पुनः स्थापित कर दिया जाता है।

jagannath भगवान की रथ यात्रा का पूर्ण विवरण।

जगन्नाथ भगवान की Rath Yatra महोत्सव सारे संसार में अतिथि एवं अद्भुत है यह भगवान jagannath, बलराम व बहन सुभद्रा जी की रथ यात्रा बड़े ही व्यवस्थित और श्रद्धा के साथ आषाढ़ शुक्ल पक्ष की द्वितीया को शाम के समय जगन्नाथ मंदिर से थोड़ी दूर में स्थित गुंडीचा मंदिर के पास तक खींचकर लाया जाता है और भगवान जगन्नाथ जी को दूसरे दिन मूर्तियों को विधिपूर्वक उतार लिया जाता है और मंदिर में लाया जाता है।

सात दिवस तक उस मंदिर पर निवास करते हैं। 7 दिनों के बाद जब आषाढ़ शुक्ल पक्ष की दशमी पड़ती है तब भगवान जी की वापसी इन्हीं रथों के माध्यम से दिया जाता है।  इस रथयात्रा को बाहुडा यात्रा कहा जाता है। प्रक्रिया में पुनः गुंडीचा मंदिर से जगन्नाथ भगवान को लाकर जगन्नाथ मंदिर में स्थापित किया जाता है और धर्म में लाकर रख दिया जाता है इस प्रक्रिया रथ यात्रा की पूर्ण होती है।

भगवान jagannath की पूजा कब किया जाता है?

जगन्नाथ मंदिर भव्य महोत्सव प्रतिवर्ष आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया के दिन मनाया जाता है। यह हिंदुओं का सबसे बड़ा त्यौहार में से एक त्यौहार है इस विशाल रथ यात्रा के दर्शन के लिए लाखों श्रद्धालु यहां आते हैं और अपनी मनोकामना पूर्ण करने के लिए भगवान की पूजा अर्चना ध्यान और दान करते हैं।

भगवान jagannath की रथयात्रा के दिन क्या करें?

हिंदुओं में जगन्नाथ भगवान अर्थात कृष्ण के प्रति अत्यंत श्रद्धा एवं भाव होता है वह Rath Yatra में शामिल होना अपने सौभाग्य की बात समझते हैं कई श्रद्धालु मुख्य रथ यात्रा में शामिल नहीं हो पाते हैं वे नगर के किसी भी जगन्नाथ रथ यात्रा में शामिल होकर इस महान यज्ञ में आहुति दे सकते हैं और उपासना कर सकते हैं। उन्हें भोग लगाना भी चाहिए और अंत में भजन कीर्तन करना चाहिए।

संतान प्राप्ति के लिए भगवान jagannath जी की पूजा में क्या करें?

पुत्र पुत्री की कामना की इच्छुक दंपत्ति मिलकर पीतांबर वस्त्र धारण करके अगर भगवान की पूजा करते हैं तो उन्हें निश्चित ही संतान की प्राप्ति होती है ऐसी मान्यता है। भगवान की पूजा के दौरान मालपुए का भोग अवश्य लगाना चाहिए, साथ ही भोग लगाए हुए प्रसाद मालपुए क्यों दो हिस्सों में बांट लेना चाहिए और एक पत्नी को लेना चाहिए और पति को देना चाहिए प्रसाद के रूप में ग्रहण करना चाहिए। जो दंपत्ति संतान की प्राप्ति चाहता है उन्हें बाल गोपाल की पूजा जाप और संतान प्राप्ति हेतु प्रार्थना करनी चाहिए।

घर में सुख शांति प्रेम और सहद्र बनाने के लिए जगन्नाथ जी भगवान की पूजा कैसे करें?

जगन्नाथ भगवान दीन दुखियों के पालन करता है उनके ध्यान प्रार्थना एवं पूजा से वे अति प्रसन्न होते हैं और घर में प्रेम सुख शांति बनी रहती है। हमें परिवार की खुशहाली के लिए घर में भगवान jagannath जी की बलभद्र जी की एवं सुभद्रा जी की चित्र या मूर्ति अवश्य स्थापित करना चाहिए। प्रतिदिन उनका सोलह श्रृंगार करके दीपक जलाना चाहिए। कोशिश होनी चाहिए कि भजन कीर्तन हो और हरि बोल हरि बोल के ध्वनिमत से भगवान का जय जयकार प्रतिदिन होने चाहिए। अंत में प्रसाद सभी परिवार के सदस्यों को देना चाहिए इससे घर में संपूर्ण खुशहाली बनी रहती है।

दरिद्रता, रोग एवं पीड़ा से कैसे मुक्ति पा सकते हैं?

सभी दुखों से कष्टों से एवं रोगों से बचने के लिए भगवान जगन्नाथ हितकारी है। भगवान जी को भोग प्रसाद तुलसी दल व चंदन लगाना चाहिए और प्रसाद को सभी भक्तों गानों को देना चाहिए गीता का पाठ 11 वीं अध्याय का पाठ होना चाहिए गजेंद्र मोक्ष पाठ भी अत्यंत लाभकारी होता है इस प्रकार जो भगवान की पूजा आराधना कर प्रसाद ग्रहण करता है उनके समस्त पाप नष्ट जाते हैं और अंत में बैकुंठ लोक को निवास करता है।

भगवान जगन्नाथ की प्रसिद्ध है या रथ यात्रा से जुड़ी अनेक कथाएं एवं परंपराएं समय के अनुसार उजागर हुई हैं। जिन्हें हम अपने लेख में शामिल करना उचित समझते हैं जिन्हें जैसी मान्यता अच्छी लगे वे उन कथाओं एवं मान्यताओं को अपना सकते हैं:-

jagannath रथ यात्रा से जुड़ी एक रोचक कथा यह भी मानी जाती है कि कृष्ण भगवान जब गोकुल द्वारिका में होते हैं उस समय सुभद्रा अपने घर अर्थात मायके आती है और दोनों भाइयों से निवेदन करती है कि वह नगर भ्रमण करना चाहती हैं। उनकी इस इच्छा को श्री कृष्ण जी एवं बलराम जी सहर्ष स्वीकार कर लेते हैं और संपूर्ण नगर में रथयात्रा निकाली जाती है। तभी से रथयात्रा की परंपरा की शुरुआत मानी जाती है।

एक अन्य मान्यता के अनुसार ऐसा माना जाता है कि श्री कृष्ण जी अपने मामा कंस का वध करने के बाद बड़े भ्राता बलराम जी के साथ नगर की प्रजा के दर्शन के लिए रथ के माध्यम से भ्रमण करते हैं। यह रथ यात्रा कालांतर में सतत रूप से जारी रहती है।

श्री कृष्ण जी को जब मामा कंस द्वारा मथुरा आने का निमंत्रण दिया जाता है तो वह उस निमंत्रण को स्वीकार कर लेते हैं और मथुरा के लिए निकलते हैं। इसके लिए कंस द्वारा गोकुल में एक रथ सारथी के साथ साथ भिजवाया जाता है। जिसमें बैठकर श्री कृष्ण भगवान सुभद्रा और बलराम जी मथुरा की ओर जाते हैं और यहीं से इस रथ यात्रा की शुरुआत मानी जाती है।

एक अन्य कथा यह भी प्रचलित है कि गुंडीचा मंदिर में जो देवी हैं वह श्री कृष्ण भगवान की मौसी हैं। मौसी अपने बच्चों श्री कृष्ण जी, सुभद्रा एवं बलराम जी को अपने घर आने का निवेदन वह निमंत्रण देती हैं वे उसे गुंडीचा मंदिर में मासी के घर 10 दिन निवास करते हैं।

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jagannath मंदिर का वर्तमान स्वरूप कैसा है?

वर्तमान समय में मंदिर अत्यंत व्यस्त होता है धार्मिक एवं सामाजिक कार्यों में बड़े-बड़े आयोजन होते हैं यहां की रसोई भारत की सबसे बड़ी रसोई मानी गई है। यहां पर विशाल महाप्रसाद के निर्माण की के लिए 800 से अधिक रसोइए और उनके सहयोगियों की टीम होती है जो प्रसाद को तैयार करती है।

इस मंदिर में गैर हिंदू लोगों व्यक्तियों का प्रवेश पूर्णत: प्रतिबंधित है। पर्यटक भी यहां नहीं आ सकते हैं। पर्यटक गण मंदिर को बाहर से ही देख सकते हैं और आयोजन को भी देख सकते हैं।  वहीं पास स्थित एक रघुनंदन पुस्तकालय हैं वहां की छत में जाकर वह चारों दिशाओं का अवलोकन कर सकते हैं। प्राचीन समय में यहां अनेक और भी मंदिर हुआ करते थे इसकी जानकारी हमें मिल रही है यहां पर विभिन्न राजाओं की वंशावली, मूल प्रमाण दे रहे हैं ऐसा माना जाता है कि यह मंदिर आदिवासियों द्वारा भी पूजन किया जाता रहा है।

क्या यात्रा में शामिल होने वाले को मिलता हैं यज्ञ बराबर पुण्य?

भगवान jagannath को श्रीकृष्ण का अवतार माना गया हैं। जिनकी महिमा का उल्लेख धार्मिक ग्रंथों एवं पुराणों में भी किया गया हैं। ऐसी मान्यता हैं कि जगन्नाथ रथयात्रा में भगवान श्रीकृष्ण और उनके भाई बलराम और बहन सुभद्रा का रथ होता हैं। जो इस रथयात्रा में शामिल होकर रथ को खींचते हैं उन्हें सौ यज्ञ के बराबर पुण्य लाभ मिलता हैं।

रथयात्रा के दौरान लाखों की संख्या में लोग शामिल होते हैं एवं रथ को खींचने के लिए श्रद्धालुओं का भारी तांता लगता हैं। जगन्नाथ यात्रा हिन्दू पंचाग के अनुसार आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को निकाली जाती हैं। जो इस वर्ष 23 जून को निकलेगी। यात्रा में शामिल होने के लिए देश भर से श्रद्धालु यहां पहुँच रहें हैं।

आखिर Supreme Court द्वारा इस वर्ष क्यों लगाई जा रही है रथ यात्रा पर रोक?

यह सभी जानते हैं कि आज संपूर्ण विश्व को रोना महामारी जैसे भीषण वायरस रोग से जूझ रहा है। jagannath पुरी में प्रत्येक वर्ष होने वाले रथ यात्रा में लगभग 1000000 लोग शामिल होते हैं और भगवान की पूजा एवं अर्चना करते हैं। कोरोनावायरस के भीषण संक्रमण को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश दिया है कि जगन्नाथ रथ यात्रा इस वर्ष स्थगित की जाएगी।

क्योंकि इससे महामारी फैलने की प्रबल आशंका है। जगन्नाथ रथ यात्रा पर रोक 1737 में लगी थी। लगभग 284 वर्षों बाद जगन्नाथ रथ यात्रा पर रोक लगी है अगर इसके संपूर्ण इतिहास को शामिल करें तो लगभग 32 बार भगवान जगन्नाथ के रथ यात्रा स्थगित करनी पड़ी है।

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रथ यात्रा के लिए मिला सुप्रीम कोर्ट का अनुमति।

करोना महामारी को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पहले रोक लगा दी गयी थी। लेकिन 1 दिन पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने कुछ नियम व शर्तो के बीच रथ यात्रा निकलने की अनुमति दे दी है।

पुरी में भगवान श्री जगन्नाथ रथयात्रा आज निकाली जाएगी। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को इसके लिए अनुमति दे दी। हालांकि कोर्ट ने ओडिशा सरकार को निर्देश दिए कि यात्रा के दौरान पुरी में कर्फ्यू लगाया जाए। रथ को 500 से ज्यादा लोग ना खींचें और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करें।

रथयात्रा की अनुमति देते हुए शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि यात्रा में शामिल सभी लोगों का कोरोना टेस्ट कराया जाए। साथ ही यदि हालात बेकाबू होते दिखें तो ओडिशा सरकार यात्रा को रोक सकती है। साथ ही कहा कि पुरी के अलावा ओडिशा में कहीं और यात्रा नहीं निकाली जाएगी।

वहीं भगवान श्री जगन्नाथ रथयात्रा को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा, स्वास्थ्य संबंधी सुरक्षा मानकों का पालन करते हुए मंदिर प्रशासन को रथयात्रा की अनुमति दी जा सकती है। उन्होंने कहा, अगर भगवान जगन्नाथ को कल (मंगलवार) बाहर नहीं लाया गया तो परंपरा के मुताबिक अगले 12 साल तक बाहर नहीं निकाला जा सकता है। सदियों की परंपरा नहीं तोड़ सकते।

तो फाइनली इज़ाज़त मिल गयी है लेकिन पूरा नियम और शर्तो का पालन करना होगा।

भगवान् जगन्नाथ रथ यात्रा की आप सभी को अनंत शुभकामनाये। धन्यवाद्

 

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