Maharana Pratap और उनके संपूर्ण जीवन से संबंधित प्रमुख घटना।

Maharana Pratap

 

प्रताप का सिर कभी झुका नहीं इस बात से अकबर भी शर्मिंदा था।
मुगल कभी चैन से सो ना सके जब तक मेवाड़ी राणा जिंदा था।।

भारत माता के सच्चे सपूत और महान देशभक्त Maharana Pratap जी अपने स्वाभिमान और संप्रभुता की रक्षा के लिए संपूर्ण जीवन अर्पित करने वाले महाराणा प्रताप जी थे। महाराणा एक ऐसे महान व्यक्ति थे जिसका नाम सुनते ही आंखों में तेज, जोश व मौत से भी लड़ जाने का साहस पैदा हो जाए। जिसके हौसले से पहाड़ भी छोटा पड़ जाए, दुश्मन भी थर थर कांपने लगे। Maharana Pratap जी को दृढ़ता, शिष्टता और राजपूत वीरता का प्रतिबिंब माना जाता है। महाराणा जी एक ऐसे राजा थे जो विषम परिस्थितियों में भी किसी के आगे नहीं झुके और वह साहस और बहादुरी के साथ ही प्रजा पालक वह राज्य से प्रेम करने वाले व्यक्ति थे। आज हम सब उनके साहस को सलाम करते हैं और उनके संपूर्ण जीवन से संबंधित प्रमुख घटनाओं पर प्रकाश डालेंगे। देशभक्ति की परिभाषा क्या होती है यह हमें महाराणा प्रताप ही सीखा सकते हैं।

द्वंद्व कहां तक पाला जाए, युद्ध कहां तक टाला जाए।

तू है वंशज राजपुताना का, फेंक जहाँ तक भाला जाये।।

महान स्वाभिमानी, क्षत्रिय कुल भूषण, सत्य सनातन धर्म की आन-बान-शान, माँ भारती के वीर सपूत, वीर शिरोमणी Maharana Pratap की 480वीं जयंती की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाऍ
धन्य है माँ जिसने अपनी गोख से ऐसे माँ भारती के सपूत को जन्म दिया है जिसके नाम लेते ही खून में उबाल दौड़ने लगता है।

Maharana Pratap

वीर Maharana Pratap का जन्म:-

महाराणा प्रताप सिंह का जन्म सिसोदिया राजवंश में जेष्ठ मास, शुक्ल पक्ष की तृतीया को 9 मई 1540 ई. में कुंभलगढ़ राजस्थान में पिता उदय सिंह एवं माता रानी जयवंता बाई जी के घर में हुआ था। महाराणा जी के बचपन का नाम कीका था। Maharana Pratap जी बचपन से ही शिक्षा खेलकूद एवं हथियार कला के क्षेत्र में विशेष रूचि लेते थे।

Maharana Pratap के जन्म के समय तात्कालिक परिस्थितियां:-

महाराणा प्रताप जी का जन्म उस समय हुआ जब संपूर्ण भारत में राजनीतिक अस्थिरता विद्यमान थी मुगल अपनी पैठ जमाने में लगे थे। स्थानीय राजाओं के मध्य युद्ध आम बात थी। लोदी वंश का पतन पूर्णता हो चुका था। राजपूत क्षेत्र काफी मजबूत होते जा रहे थे लेकिन आपसी युद्ध थी तेजी से हो रहे थे।

Maharana Pratap जी का राज्य अभिषेक राज्याभिषेक:-

महाराणा प्रताप जी का राज्याभिषेक एवम् सिंहासनासिन 1 मार्च 1573 ईस्वी में किया गया। प्रारंभ में Maharana Pratap जी के पिता उदय सिंह अपने छोटे बेटे जगमाल सिंह को सिंहासन पर बैठाना चाहते थे परंतु वहां के मंत्रियों एवं सरदारों ने  महाराणा प्रताप को हर दृष्टि कुशल होने के कारण राजा बनाना चाहते थे। बप्पा रावल के पुत्र महाराणा प्रताप प्रजा की इच्छा को सर्वोपरि मानते हुए जनता का नेतृत्व करने का दायित्व ने स्वीकार किया।

बाद में जगमाल सिंह ने बदला लेने के लिए मुगलों का सहारा लिया और उनकी सेवा सेना में शामिल हो गए मेवाड़ क्षेत्र को अधिकार में लेने की इच्छा अकबर की शुरू से ही थी जगमाल सिंह अनेक गुप्त बातें अकबर को बताया जिससे प्रसन्न होकर शहजपुर शहर की सल्तनत जग अमल को प्रदान कर दी।

महाराणा प्रताप का जिस समय राज्यारोहण हो रहा था उस समय उन्होंने घोषणा में कहा था
“जब तक मैं सम्पूर्ण मेवाड़ को सारे मुगलों की कैद से आजाद नहीं करवा लूंगा, तब तक मैं राजभवन में नहीं रहूंगा। राजसी ताज और वेशभूषा भी नहीं धारण करूंगा। ना चांदी और सोने के बर्तन में भोजन करूंगा। ना पलंग पर सोऊंगा। रुखा सुखा खाकर आजादी के लिए संघर्ष करता रहूंगा।”

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Maharana Pratap

Maharana Pratap का व्यक्तिगत जीवन-

महाराणा प्रताप का प्रथम विवाह 17 वर्ष में अजब् (15 वर्ष) के साथ 1557 में हुआ था 2 वर्ष बाद उनके पुत्र अमर सिंह का जन्म हुआ। प्रताप जी ने अपने जीवनकाल में कुल 11 शादियां की एवं उनके कुल 17 पुत्र हुए।

Maharana Pratap जी की शारीरिक बनावट एवं उनका व्यक्तित्व:-

महाराणा प्रताप जी शारीरिक एवं मानसिक क्षमता में अद्वितीय व्यक्तित्व के धनी थे उनकी लंबाई 7.5 फीट से भी अधिक थी। इनका वजन 110 किलो था। महाराणा प्रताप जी के बारे में अनेक किस्से व लोकगाथाएँ प्रचलित हैं। हम हकीकत की बात करें तो उनके छाती के कवच का वजन 72 किलो होता था लगभग 80 किलो का भाला होता था वे 208 किलो की वजनदार सामान को लेकर चलते थे।

जिसमे उनके कवच से लेकर तलवार , भाला और अन्य चीज रहता था ।उनके पास उस समय का सर्वश्रेष्ठ घोड़ा चेतक था। उनकी प्रजा ही उनकी सैनिक हुआ करती थी। महाराणा प्रताप जी में साहस की प्रवृत्ति, अनुशासन, कुशल नेतृत्व, बड़ों और महिलाओं का सम्मान, ऊंच-नीच की भावनाओं से रहित, शस्त्र और शास्त्र दोनों का उत्कृष्ट ज्ञान का समायोजन, श्रेष्ठ कूटनीतिज्ञ एवम् श्रेष्ठ राजनीतिज्ञ के रूप में प्रतिष्ठित थे।

जब एक सच्चे मुसलमान ने महाराणा की जान बचाई:-

हल्दीघाटी का युद्ध तो आपने बचपन में जरूर पढ़ा होगा। यह युद्ध 21 जून 1576 में अकबर की सेनापति मानसिंह व् प्रताप जी के मध्य हल्दीघाटी क्षेत्र में हुआ था। यह युद्ध इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि इसने भारत के आने वाले भविष्य की दिशा तय की। अकबर की सेना के मुकाबले महाराणा प्रताप की सेना लगभग एक चौथाई के बराबर थी। पूरी सेना महाराणा प्रताप के सैनिकों वहां उनके ऊपर हमला की। जब महाराणा की जान को खतरा देख एक उनका वफादार सैनिक हकीम खान सूर ने उनके ऊपर होता वार स्वयं अपने ऊपर ले लिया और इस तरह उन्होंने शहीद होकर महाराणा की जान बचाई। उनकी वीरता को आज भी याद किया जाता है।

जब भाई शक्ति सिंह ने दुश्मनी भुलाकर महाराणा प्रताप जी का साथ दिया:-
महाराणा प्रताप के अनेक भाई थे उनमें आपसी वैमनस्यता भी थी एक भाई शक्ति सिंह ने महाराणा जी से बदला लेने के लिए अकबर के पक्ष में होकर हल्दीघाटी में युद्ध कर रहा था। महाराणा प्रताप के साहस और शौर्य को देखकर भाई शक्ति सिंह के मन में उनके लिए सम्मान और प्रेम जाग उठा। जब महाराणा प्रताप अत्यधिक घायल हो गए थे तो मुगल सैनिक उनका पीछा कर रहे थे तब दोनों सैनिकों को मार कर शक्ति सिंह ने महाराणा जी की जान बचाई थी। उन्होंने गुप्त बातें भी महाराणा को बताई।

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Maharana Pratap

Maharana Pratap का संघर्ष एवम् त्याग:-

महाराणा प्रताप एक संपन्न राज्य से थे वे चाहते तो अधीनता स्वीकार कर हमेशा राजसी सुख सुविधाओं का लाभ ले सकते थे परंतु उन्होंने इन सब का त्याग कर समर्पण, देशभक्ति, संघर्ष के रास्तों को चुना। हल्दीघाटी के युद्ध का परिणाम किसी के पक्ष में नहीं रहा। महाराणा जी की अधिकांश सेना शहीद हो चुकी थी, परंतु वे अपना धैर्य और साहस को बनाए हुए थे। वेदर दर वनों में भटक रहे थे। कई कई बार भोजन छोड़कर जगह बदलना होता था। एक बार उनकी पत्नी और पुत्र वधू ने घास के छोटे-छोटे बीजों को पीसकर कुछ रोटियां बनाई थी उनमें से आधे रोटियां अपने बच्चों के लिए और बची हुई रोटियां अगले दिन के लिए रख दी थी।

परंतु कुछ देर बाद एक बिल्ली आकर बच्ची के यहां से रोटी छीन कर ले गई वह बच्ची भूख प्यास से रोने लगी यह देखकर राणा जी का दिल बहुत दुखा वह स्थिर होकर सोचने लगे कि क्या मैं इसी दिन के लिए इतना संघर्ष कर रहा था और अपने आप पर धिक्कार करने लगे करोड़ होने लगे इसके बाद मन में विचार किया कि अब संधि कर लेना चाहिए और एक अकबर को चिट्ठी लिखी बाद में उन्होंने अपने आप को संभाला और कहा कि शेर कभी सियारों के सामने समर्पण नहीं करता। इस तरह अपने जीवन काल तक उन्होंने मातृभूमि की रक्षा के लिए संघर्ष करते रहे।

अकबर महाराणा प्रताप के शौर्य और पराक्रम से भयभीत रहता था इसके लिए अनेक गुप्तचर प्रताप जी के पीछे लगाए हुए थे। एक बार जब गुप्तचर राणा जीके पास पहुंचे तो देखा कि वहां जंगल में सभी आनंदित और खुशी के साथ जंगली कंदमूल फल पत्ते एवं घास की रोटियां जड़े आदि खा रहे हैं। कोई सैनिक दुखी नहीं है जब इस बात की सूचना अकबर तक पहुंची तो अकबर भी बहुत दुखी हुआ और महाराणा प्रताप का मन ही मन सम्मान किया साथ ही अपने सैनिक सरदार अब्दुल रहीम खानखाना के सामने उनकी प्रशंसा भी की। उन्होंने लिखा “इस संसार में सभी नाशवान है, महाराणा ने धन और भूमि को छोड़ दिया पर उसने कभी अपना सिर नहीं झुकाया। हिंदुस्तान के राजाओं में वही एकमात्र ऐसा राजा है जिसने अपनी राजपूत धर्म के गौरव को बनाए रखा है।”

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Maharana Pratap

आखिर कौन था महान साहसिक रामप्रसाद?

आप सभी ने जब-जब Maharana Pratap के बारे में सुना होगा तब तब उनके घोड़े चेतक का नाम जरूर याद आया होगा, लेकिन एक और ऐसे शौर्य व पराक्रम की पराकाष्ठा प्राप्त एक सैनिक था जिसका नाम था रामप्रसाद। यह कोई इंसान नहीं बल्कि एक हाथी था जो इतिहास के पन्नों में स्वर्णिम अक्षर से उसके स्वामी भक्ति के लिए जाना जाता है। हल्दीघाटी युद्ध के दौरान अकबर ने महाराणा और रामप्रसाद को ही बंदी बनाने का आदेश दिया था। रामप्रसाद इतना स्वामी भक्त होने के साथ एक चतुर व अत्यंत ताकतवर हाथी था। उसने दुश्मन सेना के 13 बड़े हाथियों को अकेले अपने शौर्य से मार गिराए थे।

इससे परेशान होकर अकबर की सेना ने चक्रव्यूह का निर्माण किया और 7 बड़े हाथियों से उसे घेरने में सफलता प्राप्त की। बाद में अकबर के समक्ष रामप्रसाद को लाया गया और उसका नाम पेड़ प्रसाद रख दिया गया। सैनिकों द्वारा उसे खाने को दिया गया परंतु वह राणा की स्वामीभक्ति को न भूलते हुए खाना नही खाया। इस तरह 18 दिनों तक भूखा रहने के बाद प्राण त्याग दिया। राम प्रसाद की स्वामी भक्ति को देखकर अकबर ने कहा था “जिसके हाथी को मैं मेरे सामने नहीं झुका पाया, उस महान महाराणा प्रताप को मैं क्या झुका पाऊंगा।”

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Maharana Pratap

चेतक ने आखिर कैसे बचाया Maharana Pratap जी को?

प्रताप जी यूं तो जीव जंतुओं पशुओं एवम् प्रकृति से अत्यंत प्रेम करते थे परंतु उन्हें सबसे प्रिय रामप्रसाद हाथी और चेतक ना नामक घोड़ा था हल्दीघाटी युद्ध के दौरान जब महाराणा प्रताप जी अत्यधिक घायल हो चुके थे, साथ ही उनका घोड़ा चेतक भी घायल था परंतु फिर भी चेतक ने स्वामी भक्ति को चरितार्थ करते हुए अपने स्वामी को सुरक्षित स्थान ले जाने का प्रयास किया महाराणा जी के पीछे अनेक दुश्मन के सैनिक पीछा कर रहे थे परंतु बिजली की भांति चेतक भाग रहा था घाटी होने की वजह से एक बरसाती नाला सामने दिखाई देता है चेतक में अपना पराक्रम दिखाते हुए 25 फीट चौड़े नाले को बड़े ही साहस से लांग जाता है चेतक द्वारा यह छलांग इतिहास में अमर हो गई.

इस्लाम को विश्व इतिहास में अत्यंत नायाब माना जाता है। कुछ दूर चेतक चलने के बाद महाराणा जी को एक आवाज सुनाई देती है वह आवाज उसके भाई शक्ति सिंह की होती है शक्ति सिंह महाराणा को मारने के लिए पीछा नहीं कर रहा था बल्कि उन सैनिकों को मारने के लिए पीछा कर रहा था। वे सभी सैनिकों को मार कर यमलोक पहुंचा देते हैं जीवन में पहली बार दोनों भाई प्रेम से गले मिलते हैं इसी बीच चेतक एक पेड़ के समीप जाकर गिर जाता है शक्ति सिंह अपने घोड़े को प्रताप को दे देता है और उन्हें सुरक्षित स्थान जाने के लिए कहता है आज भी पेड़ को घोड़ी इमली कहां जाता है। वहीं चेतक की मृत्यु हो जाती है जिस तरह चेतक ने अपना धर्म निभाया उसे आज भी याद किया जाता है।

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हल्दीघाटी का प्रसिद्ध युद्ध एवं परिणाम:-

Maharana Pratap जी मातृभूमि के प्रति सर्वस्व निछावर करने के लिए प्रतिबद्ध थे। अकबर राजनीतिक महत्वाकांक्षा के कारण लगभग 8 बार अपने दूतों को महाराणा के दरबार में भेजा था और अधीनता स्वीकार करने के लिए संदेश भेजा था। महाराणा प्रताप प्रत्येक बार दूतों का यथा सम्मान पूर्वक सेवा कर उन्हें स्पष्ट रूप से यह संधि अस्वीकार कर देते थे।

वास्तव में अकबर महाराणा प्रताप के शौर्य और ताकत को जानता था इसीलिए वह प्रत्यक्ष युद्ध करने से बचने की कोशिश कर रहा था। परंतु इतनी बार संधि प्रस्ताव देने के कारण जनता द्वारा अकबर का मजाक उड़ाना शुरू हो चुका था। अकबर को यह बर्दाश्त नहीं हुआ और अंततः उसने युद्ध की घोषणा की इस युद्ध को हल्दीघाटी का युद्ध कहा जाता है। यह युद्ध कलिंग युद्ध के बाद दूसरा भीषणतम युद्ध माना गया।

अकबर स्वयं युद्ध करने से बच रहा था क्योंकि वह जानता था कि अगर मैं Maharana Pratap से युद्ध करूंगा तो निश्चित ही मेरी हार होगी इसीलिए वह अपने सेनापति मानसिंह के नेतृत्व में 80000 सैनिकों को हल्दीघाटी क्षेत्र में युद्ध के लिए कूच करने की आज्ञा दी। महाराणा की सैन्य शक्ति मात्र 20000 की थी परंतु महाराणा के सैनिक 10 मुगल सैनिकों के बराबर साहस रखते थे।

युद्ध 21 जून 1776 में हल्दीघाटी क्षेत्र में हुई। Maharana Pratap जी ने सेनापति मानसिंह को लक्ष्य बनाकर उनकी ओर बढ़े मान सिंह हाथी में सवार था हाथी के पैरों में लोहे और तलवार लगे हुए थे परंतु इसकी परवाह किए बगैर चेतक ने एक पैर हाथी के दांत पर रखकर मानसिंह की ओर छलांग लगाया और Maharana Pratap अपने वाले को पूरी शक्ति के साथ मानसिंह की ओर फेंका दुर्भाग्यवश 1 इंच दूरी से वह वाला निकल गया और मानसिंह बच गया .

इसी बीच मुगल के सैनिक आ पहुंचे युद्ध भीषण हो चुका था चेतक भी घायल हो चुका था। अधिकांश सैनिक मारे जा चुके थे दोनों पक्षों के। कई इतिहासकार युद्ध का परिणाम मुगलों के पक्ष में तय करते हैं परंतु वास्तव में युद्ध का परिणाम का निर्णय न हो सका। हल्दीघाटी का युद्ध वास्तव में एक शुरुआती युद्ध था। इस युद्ध के बाद अकबर ने महाराणा को अनेक बार पकड़ने और मारने का प्रयास किया।

अकबर ने 5 वर्षों के अंतराल में लगभग एक लाख मुगल सैनिक भेजें परंतु उन्हें सफलता ना मिली कई अंग्रेज इतिहासकार ने इसे हल्दीघाटी युद्ध का दूसरा भाग कहते हैं यह युद्ध बेटल ऑफ़ देवार के नाम से जाना जाता है।इसमें मुगलों की करारी हार हुई।सन 1582 में दीवार का युद्ध हुआ अकबर की ओर से चाचा सुल्तान खान सेनापति नियुक्त हुए। इस युद्ध के बाद प्रताप ने अनेक क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया जिनमें कुंभलगढ़ बस्सी मूवी मांडलगढ़ मंदारिया जावर गोगुंदा आदि क्षेत्र शामिल थे। कर्नल जेम्स टॉड ने इस युद्ध को मेवाड़ का मैराथन का नाम दिया। महाराणा प्रताप जी आगे भी जीवन पर्यंत संघर्ष करते रहे।

जब केवल धड़ ने दुश्मनों से युद्ध किया:-

महाराणा प्रताप में नेतृत्व की चमत्कारिक शक्ति थी लोग अपना सर्वस्व निछावर करने के लिए हमेशा तत्पर रहते थे। भील जाति के लोग उनको राजा के रूप में पूज्यते थे। हल्दीघाटी युद्ध के दौरान एक ऐसे ही चमत्कारिक घटना हुई जब महाराणा प्रताप का एक सैनिक 10-10 मुगलों पर भारी पड़ रहा था। महाराणा जी के सैनिकों का साहस आप इसी बात से जान सकते हैं कि एक ऐसा सैनिक जो भीषण संघर्ष और युद्ध कर रहा होता है अचानक किसी ने उसके गले पर वार कर दिया। उसका सर धड़ से अलग हो जाता है। परंतु वह धड़ गिरने की बजाए कुछ समय तक अपने दुश्मनों से युद्ध करते रहता है। आ

सोच ही सकते हैं कि समर्पण भाव क्या होता है स्वामी भक्ति क्या होती है। हम महाराणा जी की जितनी भी प्रशंसा करें वह कम है देशभक्ति सीखनी है तो महाराणा के आदर्शों को अपना लो किसी और की तरफ देखने की जरूरत भी ना पड़ेगी। मातृभूमि सबसे बड़ी मां होती यह नहीं भूलना चाहिए।

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जब महाराणा ने घोड़े सहित कुख्यात सैनिक को काट डाला:-

आप सभी जानते हैं कि अकबर अनपढ़ था परंतु वह बहुत चतुर एवं अवसरवादी था। उसने अपनी सेना में कुख्यात सैनिकों की भर्ती की थी। उनमें एक बहलोल खान नाम का कुख्यात सैन्य अधिकारी था उसकी ऊंचाई 7.5 फीट से अधिक थी। उसके नाम से लोग थरथर कांपते थे। बहलोल खान सैकड़ों लोगों को मौत के घाट उतार चुका था।

महाराणा प्रताप को डराने के लिए उन्होंने बहलोल खान को चुना और एक सैन्य टुकड़ी देकर बहलोल खान को राणा के पास युद्ध के लिए भेजा। बहलोल खान जब महाराणा की सीमा में पहुंचा तो युद्ध के लिए ललकारा महाराणा भी इसके लिए तैयार थे और वे दोनों आमने-सामने थे ही, जैसे ही बहलोल खाने महाराणा पर वार करने के लिए तलवार उठाया, महाराणा प्रताप ने पलक झपकते बहलोल खान को बीच से काट डाला।

प्रताप जी का वार यहीं नहीं रुका बहलोल खान जिस घोड़े पर बैठा था वह घोड़ा भी बीच से कट गया आप सो सकते हैं महाराणा प्रताप के ताक ताक ताकत के बारे में इस तरह थे हमारे महाराणा प्रताप जी जिनके किससे आज भी राजस्थान के लोक गाथाओं में अत्यंत प्रसिद्ध है।

Maharana Pratap जी की मृत्यु कैसे हुई?

महाराणा प्रताप जी जंगलों में रहा करते थे और गोरिल्ला युद्ध के माध्यम से मुगल सल्तनत को चोट पहुंचाया करते थे। 1597 ऐसे में ऐसा कहा जाता है कि महाराणा आखेट के लिए जंगल गए जहां वह आंखेंट के दौरान घायल हो गए और 29 जनवरी 1597 में मात्र 56 वर्ष की आयु में राजधानी चावंड राजस्थान में उनकी मृत्यु हो गई। ऐसा भी कहा जाता है कि अनेक युद्ध लड़ने के कारण हुए घाव और चोटों के कारण उनकी मृत्यु हुई।

महाराणा की मृत्यु का खबर सुनकर उस दिन अकबर भी रोया था। इन्हीं सब बातों से आप समझ सकते हैं कि वह कितने महान थे। हमें भी उनके दिखाए हुए मार्ग पर चलना चाहिए और अन्याय, अत्याचार, और अधर्म के विरुद्ध हथियार उठाना चाहिए।यही हमारा कर्तव्य हो। महाराणा प्रताप जी के लिए यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

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सिटी पैलेस उदयपुर

क्या Maharana Pratap जी के वंशज आज भी जीवित हैं?

Maharana Pratap जी के वंशज आज भी जिन्दा हैं। वे उदयपुर क्षेत्र में आज भी निवासरत हैं। सिसोदिया वंश उदयपुर के सिटी पैलेस में निवास करते हैं। यह इस क्षेत्र के शासक नहीं वरन् संरक्षक के रूप में माने जाते हैं। अरविन्द सिंह मेवाड़ व् महेंद्र सिंह इस वंश के उत्तराधिकारी हैं।

इतिहास से संबंधित अनेक प्रश्न हमारे पाठकों के मन में आते हैं हम उनके इन प्रश्नों का उत्तर अवश्य देंगे। आप निशुल्क दूरभाष नंबर 7999314964 पर संपर्क कर सकते हैं और अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। आप अपनी सुझाव भी हमें दे सकते हैं। धन्यवाद.

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