Saraswati Puja एवं बसंत पंचमी क्यों और कैसे मनाया जाता है।

Saraswati

दोस्तों आज हम Saraswati Puja एवं बसंत पंचमी के बारे सबकुछ जानेंगे तो आईये शुरू करते है।

महात्म्य बोध:-

बसंत पंचमी Saraswati puja शिक्षा साक्षरता विद्या और विनय का पर्व है। कला विविध को गुण विद्या को साधना को बढ़ाने उन्हें प्रोत्साहित करने का पर्व है बसंत पंचमी। मनुष्य में सांसारिक व्यक्तिगत जीवन का सौष्ठव, सौंदर्य मधुरता उसकी सुव्यवस्था यह सब विद्या शिक्षा तथा गुणों के ऊपर ही निर्भर करते हैं। अशिक्षित गुण इन बर्लिन व्यक्ति को हमारे यहां पशु तुल्य माना जाता है “साहित्य संगीत कलाविहीन:। साक्षात पशु:पुच्छविषाण हीन:।।

इसलिए हम अपने जीवन को इस पशुता से ऊपर उठाकर विद्या संपन्न गुण संपन्न गुणवान बनाएं बसंत पंचमी इसी की प्रेरणा का त्यौहार है।भगवती Saraswati के जन्मदिन पर उनके अनुग्रह के लिए कृतज्ञता भरा अभिनंदन करें- उनकी अनुकंपा का वरदान प्राप्त कर होने की पुण्यतिथि पर हर्षोल्लास मनाएँ, यह उचित ही है। दिव्य शक्तियों को मानवीय आकृति में चित्रित करके ही उनके प्रति भावनाओं की अभिव्यक्ति संभव है।

भावो उद्दीपन मनुष्य की निज की महती आवश्यकता है। शक्तियां सूक्ष्म, निराकार होने से उनकी महत्ता तो समझी जा सकती है, शरीर और मस्तिष्क द्वारा उनसे लाभ उठाया जा सकता है, पर अंतः करण की मानस चेतना जगाने के लिए दिव्य तत्वों को भी मानवीय आकृति में संवेदना युक्त मन: स्थिति में मानना और प्रतिष्ठित करना पड़ता है। इसी चेतना विज्ञान को ध्यान में रखते हुए भारतीय तत्वों ने प्रत्येक दिव्य शक्ति को मानुषी आकृति और भाव गरिमा में संयोजा है। इनकी पूजा-अर्चना वंदना धारणा हमारी अपनी चेतना को उसी प्रतिस्थापित देव गरिमा के समतुल्य उठा देती है। साधना विज्ञान का सारा ढांचा इसी आधार पर खड़ा है।

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भगवती Saraswati की प्रतिमा मूर्ति अथवा तस्वीर के आगे पूजा-अर्चना की प्रक्रिया की जाए-

इसकी सीधा इसका सीधा तात्पर्य है कि शिक्षा की महत्ता को स्वीकार शिरोधार्य किया जाए, उनके सामने मस्तिष्क झुकाया जाए अर्थात मस्तक में उनके लिए स्थान दिया जाए पुणिराम अपनी आज ही ज्ञान सीमा जितनी है उसे और अधिक बढ़ाने का प्रयत्न किया जाए। वास्तव में संग्रह करने और बढ़ाने योग्य संपदा धन नहीं ज्ञान है। लक्ष्मी नहीं विद्या का अधिक संग्रह संपादन किया जाना चाहिए। परीक्षा के लिए पढ़ना भी अच्छा है। विदेशों में श्रमजीवी व्यापारी शिल्पी तथा दूसरे लोग रात्रि विद्यालयों में निरंतर पढ़ते रहते हैं तथा बचपन में स्वल्प शिक्षा रहते हुए भी धीरे-धीरे ज्ञान संपदा बढ़ाते चलते हैं और जीवन के अंत तक अपनी रूचि के विषय में निष्णात बन जाते हैं,

ऊंची से ऊंची उपाधि प्राप्त कर लेते हैं। अपने देश में यह समझा जाता है कि विद्या नौकरी के लिए प्राप्त की जानी चाहिए- यह विचार बहुत ही अच्छा और निकृष्ट है। उसमें विद्या कि हेटी खोटी समझ कर उसका अपमान करने की धृष्टता छिपी हुई है। विद्या मनुष्य के मस्तिष्क के व्यक्तित्व के गौरव के निखार एवं विकास के लिए है। पेट के लिए अन्न की तरह वह मस्तिष्क के पोषण में सहायक है। हमें पेट भरने के लिए की तरह मानसिक भूख बुझाने के लिए दैनिक जीवन में अध्ययन के लिए स्थान रखना चाहिए।

जिन्हें सरकारी पाठ्यक्रम परीक्षा स्तर की पढ़ाई पढ़नी हो वे रात्रि विद्यालयों, ट्यूटोरियल स्कूलों की व्यवस्था और उनके आधार पर पढ़ाई जारी रखें। जिन्हें किन्ही विशेष विषयों में रुचि हो उनका साहित्य खरीदकर कर अथवा पुस्तकालय द्वारा प्राप्त कर अपने ज्ञान गरिमा बढ़ाएं। भगवती सरस्वती के पूजन के साथ-साथ इस स्तर की प्रेरणा ग्रहण करने और उस दिशा में कुछ कदम बढ़ाने का साहस करना चाहिए। स्वाध्याय हमारे जीवन का दैनिक भाग होना चाहिए। ज्ञान की गरिमा को हम समझने लग जाए और उसके लिए मन में तीव्र उत्कंठा जाग पड़े तो समझना चाहिए कि सरस्वती पूजन की प्रक्रिया ने अंतःकरण तक प्रवेश पा लिया।

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अपने देश में साक्षरता दर 70% से अधिक पहुंच गई है।

परंतु यह कुशल कारीगरों इंजीनियरों तकनीकी कर्मचारियों डॉक्टरों को तैयार करने में समर्थ नहीं है। यह स्थिति भुखमरी से भी अधिक भयावह है यदि मनुष्य शरीर मात्र बन कर दिए उसकी बौद्धिक परिधि चोरी ना हो सकी तो उसे पशु जीवन ही कहा जाएगा उन्हें राम अपने देश की तीन चौथाई जनसंख्या निम्न स्तर का जीवन यापन कर रही है विराम अन्य का अकाल जब पड़ता है तब सरकारी गैर सरकारी स्तर पर दयालु दानी और लोक सेवाओं द्वारा उस कष्ट का निवारण करने के लिए कितने ही उपाय किए जाते हैं पर अत्यंत खेद की बात है कि इस बौद्धिक भुखमरी की ओर किसी का ध्यान नहीं जाता।

स्कूली बच्चों की पढ़ाई भर का थोड़ा सा प्रबंध सरकार की ओर से कर दी जाती है बाकी लौह पुरुष और महिलाएं उसी निरक्षरता की व्यथा से ग्रसित हैं छोटे देहातों में तो लड़कों के लिए भी पढ़ाई का प्रबंध नहीं पिछड़े वर्ग के लोग पढ़ाई की आवश्यकता ही नहीं समझते इसके पास गुजारे को है वे कहते हैं कि हमें अपने बच्चों से नौकरी थोड़े ही करवानी है हमके पढ़ाएं लड़कियों का पढ़ना तो अभी भी बेकार समझा जाता है। इसी स्थिति का अंत किया जाना चाहिए शिक्षकों को विद्यारण्य चुकाने के लिए अपने समीपवर्ती अशिक्षित ओं को पढ़ाने का संकल्प लेना चाहिए और एक नियत संख्या में उन्हें शिक्षित बनाकर ही रहना चाहिए।

ऊंची पढ़ाई के लिए रात्रि विद्यालय प्रौढ़ पुरुषों के लिए रात्रि पाठशालाएँ, प्रौढ़ महिलाओं के लिए अपराह्न पाठशाला में पढ़ने, योग्य बच्चों को स्कूल भिजवाने के लिए उनके अभिभावकों से आग्रह, शिक्षा को कन्याओं तक पहुंचाने के लिए वातावरण बनाना तथा व्यवस्था करना नए स्कूल खुलवाने के लिए सरकार से आग्रह एवं जनता से सहयोग एकत्रित करना चालू विद्यालयों का विकास विस्तार का प्रबंध करना। पुस्तकालयों की स्थापना, चल पुस्तकालयों का प्रवचन, छात्रों को पुस्तकें उधार देने वाले पुस्तक बैंक आदि कितने ही शिक्षा प्रसार संबंधी ऐसे कार्यक्रम हैं जिन्हें पूरे उत्साह के साथ सर्वत्र विकसित किया जाना चाहिए। बसंत पंचमी पर सरस्वती पूजन किया प्रक्रिया उचित ही होगी।

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भगवती Saraswati के हाथ में वीणा है उनका वाहन मयूर है।

मयूर अर्थात मधुर वाणी भाषी। हमें Saraswati का अनुग्रह प्राप्त करने के लिए उनका वाहन मयूर बनना चाहिए। मीठा, नम्र, विनीत, सज्जनता, शिष्टता और आत्मीयता युक्त संभाषण हर किसी से करना चाहिए। जीव को कड़वा, धृष्ट, अशिष्ट बोलने की आदत कदापि न पड़ने दें। छोटों को भी तू नहीं आप कह कर बोले; कम से कम तुम तो कहे ही सकते हो।

हर किसी के सम्मान की रक्षा करें, उसे गौरवान्वित करें, सम्मान भरा व्यवहार करें; ताकि किसी को आत्म हीनता की ग्रंथि का शिकार बनने बनाने का आप अपने सिर पर ना चढ़े। प्रकृति ने मोर को कलात्मक तथा सुसज्जित बनाया है। हमें भी अपनी अभिरुचि परिष्कृत बनानी चाहिए, हम कलाप्रेमी बने, सौंदर्य स्वच्छता और सुसज्जनता शालीनता युक्त आकर्षण अपने प्रत्येक उपकरण एवं क्रियाकलाप में नियोजित रखें; तभी भगवती Saraswati माता हमें अपना वाहन, पार्षद, प्रिय पात्र मानेगी।

हाथ में वीणा अर्थात संगीत गायन जैसी भावउत्तेजक प्रक्रिया को अपने प्रस्तुत अंतः करण में सजगता भरने के लिए प्रयुक्त करना है। हम कला प्रेमी बने, कला पारखी बने, कला के पुजारी और संरक्षक भी। माता की तरह उसका सात्विक एवं पोषकमय पान करें , कुछ भावनाओं के जागरण में उसे सजाएं। जो अनाचारी कला के साथ व्यभिचार करने पर तुले हुए हो, पशु प्रवृत्ति भड़काने और कामुकता, अश्लीलता एवं कुरुचि उत्पन्न करने में लगे हो; उनका ना केवल असहयोग विरोध ही करें परंतु विरोध भर्त्सना के अतिरिक्त उन्हें सफल बनाने में भी कुछ कसर उठा न रखें।

 बसंत पंचमी क्यों और कैसे मनाया जाता है।

Saraswati माता के “पर पर प्रकृति खिलखिला पड़ती है हंसी और मुस्कान के फूल खिल पढ़ते हैं।

उल्लास, उत्साह और प्रकृति के अभिनव सृजन के प्रतीक नवीन पल्लव प्रत्येक वृक्ष पर परिलक्षित होते हैं। मनुष्य में भी जब ज्ञान का शिक्षा का प्रवेश होता है। सरस्वती का अनुग्रह अवतरित होता है तो स्वभाव में दृष्टिकोण में क्रियाकलाप में बसंत ही दिखाई देता है। हल्की-फुल्की चिंता और चिंता रहित खेल जैसी जिंदगी जीने की आदत पड़ जाती है। हर काम की पूरी पूरी जिम्मेदारी अनुभव करने पर भी मन पर बोझ किसी भी बुरी घटना का ना पड़ने देना यही है हल्की फुल्की जिंदगी। पुष्पों की तरह अपने दांत हर समय खेलते रहते हैं।

मुस्कान चेहरे पर अठखेलियां करती रहे मेरा चित्त हल्का रखाना आशा और उत्साह से भरे रहना उमंगे उठने देना उज्जवल भविष्य के सपने सोना अपने व्यक्तित्व को फूल जैसी निर्मल निर्दोष आकर्षक एवं सुगंधित बनाना ऐसी ही अनेक प्रेरणा ए बसंत ऋतु के आगमन पर पेड़ पौधों पर नवीन लोगों नवीन पल्लवों पुष्पों को देखकर प्राप्त की जा सकती है।

कोयल की तरह मस्ती में कुकर ना भरो की तरह गूंजना गुनगुनाना यही जीवन की कला जाने वाले के चिन्ह हैं हर जड़ चेतन में बसंत ऋतु में एक सर्जनात्मक उमंग देखी जाती है वह सुमन को वासना से ऊंचा उठाकर भाव उल्लास में विकसित किया जाना चाहिए पुणिराम Saraswati का अभिनंदन प्रकृति बसंत “के रूप में करती है हम पूजा वेदी पर पुष्पांजलि भेंट करने के साथ-साथ जीवन में बसंत जैसा उल्लास कलात्मक प्रवृत्तियों का विकास और ज्ञान संवर्धन का प्रयास करके सच्चे अर्थों में भगवती का पूजन कर सकते हैं और उसका दाम अपने को तथा अन्य संघों को पहुंचा सकते हैं युग निर्माण कर सकते हैं।

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 बसंत पंचमी क्यों और कैसे मनाया जाता है।

बसंत पंचमी के दिन Saraswati पूजन के पूर्व की तैयारी।

बसंत पंचमी पर्व भारतीय उपमहाद्वीप में हमेशा से ही प्रासंगिक रही है उसकी सनातन महत्ता भी कम नहीं है। पर्व आयोजन का जो विधान यहां दिया जा रहा है वह स्वभाव उपयोगिता का ही दिया जा रहा है। प्रयास यह किया जाना चाहिए कि अपने प्रभाव क्षेत्र के सभी शिक्षा संस्थानों पुस्तकालयों आदि में बसंत पर्व प्रेरणा ढंग से बनाया जा सके। पर्व संचालन करने वाले यदि पाठ हटाकर भी तैयार किए जा सके तो तमाम स्थानों पर एक साथ ही आयोजन किए जा सकते हैं।

वैसे प्रातः मध्यान्ह और सांयकाल इन तीन समय में आवेदन विभक्त करके भी अधिक स्थानों पर कम से आयोजन कर सकते हैं उसके लिए व्यवस्था में कुशल सहयोगियों को तैयार करना पड़ता है। वह हर स्थानों पर पूर्व व्यवस्था सही ढंग से बनाकर रखें पूर्व व्यवस्था में अन्य प्रमुख की तरह पूजन मंच तथा श्रद्धालुओं के बैठने की व्यवस्था पर ध्यान दिया जाना चाहिए मंच पर माता Saraswati का चित्र वाद्य यंत्र सजाकर रखना चाहिए। चित्र में मयूर ना हो तो मयूर पंख रखना पर्याप्त है। पूजन की सामग्री तथा अक्षत पुष्प चंदन कलावा प्रसाद आदि उपस्थिति के अनुसार रखें।

पर्व पूजन क्रम।

पर्व पूजन के प्रारंभिक उपचार कर्म से रक्षा विधान तक सभी पर्वों की तरह करते हैं। विशेष पूजन क्रम में मां Saraswati का षोडशोपचार पूजन करके उनके उपकरण वाहन तथा बसंत पूजन का क्रम चलता है। इस दिन नव सृजन के लिए अपने समय प्रभाव ज्ञान पुरुषार्थ एवं साधना के अंश लगाने की सुनिश्चित रूपरेखा बनाकर ही संकल्प किया जाना उचित है। समापन क्रम अन्य पर्वों की तरह ही पूरे किए जाते हैं।

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Saraswati Puja

माता Saraswati का आवाहन एवम् पूजन।

मां Saraswati शिक्षा साक्षरता और भौतिक ज्ञान की देवी है पुणिराम क्योंकि बसंत पंचमी भी शिक्षा साक्षरता का पर्व है इसलिए इस अवसर पर प्रधान रूप से देवी सरस्वती माता का पूजन किया जाता है। सरस्वती का चित्र अथवा प्रतिमा स्थापित कर देवी सरस्वती का आवाहन करना चाहिए।
ॐ पावका न: सरस्वती, वजेभिर्वाजिनीवती।
यज्ञम् वष्ठु ध्यावसु:।।
ॐ सरस्वती नमः आवाहयामि स्थापयामि, ध्यायामि।

तदोपरांत षोडशोपचार पूजन करके प्रार्थना करें-

ॐ मोह अंधकार भरिते ह्रदये मदीये।
मात: सदैव कुरु वास मुदार भावे।

स्वीयाखिलावयव- निर्मल सुप्रभाभि:,
शीघ्रम् विनाशय मनोगतमंधकारम्।।

सरस्वती महाभागे विद्ये कमललोचने।
विद्यारुपे विशालाक्षि, विद्याम देहि नमोस्तु ते।।

वीणा धरे विपुल मंगल दानशीले,
भक्तार्ति नाशिनि बिरंचि हरिश वन्द्ये।

कीर्ति प्रदे अखिल मनोरथ दे महार्हे,
विद्या प्रदायिनी सरस्वती नौमि नित्यम्।।

ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॥ षोडशोपचार एवं पुरुषसूक्त ॥ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ

ॐ सहस्र शीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्र पात्।
स भूमिम् सर्वत स्पृत्वा ऽत्यतिष्ठद् दशांगुलम्॥1॥

पुरुषऽ एव इदम् सर्वम् यद भूतम् यच्च भाव्यम्।
उत अमृत त्वस्य ईशानो यद् अन्नेन अतिरोहति॥2॥

एतावानस्य महिमातो ज्यायान्श्र्च पुरुषः।
पादोस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्य अमृतम् दिवि॥3॥

त्रिपाद् उर्ध्व उदैत् पुरूषः पादोस्य इहा भवत् पुनः।
ततो विष्वङ् व्यक्रामत् साशनानशनेऽ अभि॥4॥

ततो विराड् अजायत विराजोऽ अधि पुरुषः।
स जातोऽ अत्यरिच्यत पश्चाद् भूमिम् अथो पुरः॥5॥

तस्मात् यज्ञात् सर्वहुतः सम्भृतम् पृषदाज्यम्।
पशूँस्ताँश् चक्रे वायव्यान् आरण्या ग्राम्याश्च ये॥6॥

तस्मात् यज्ञात् सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे॥
छन्दाँसि जज्ञिरे तस्मात् यजुस तस्माद् अजायत7॥

तस्मात् अश्वाऽ अजायन्त ये के चोभयादतः।
गावो ह जज्ञिरे तस्मात् तस्मात् जाता अजावयः॥8॥

तम् यज्ञम् बर्हिषि प्रौक्षन् पुरुषम् जातम अग्रतः।
तेन देवाऽ अयजन्त साध्याऽ ऋषयश्च ये॥9॥

यत् पुरुषम् व्यदधुः कतिधा व्यकल्पयन्॥
मुखम् किमस्य आसीत् किम् बाहू किम् ऊरू पादाऽ उच्येते॥10॥

ब्राह्मणो ऽस्य मुखम् आसीद् बाहू राजन्यः कृतः।
ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्याँ शूद्रो अजायत॥11॥

चन्द्रमा मनसो जातः चक्षोः सूर्यो अजायत।
श्रोत्राद् वायुश्च प्राणश्च मुखाद् ऽग्निर अजायत॥12॥

नाभ्याऽ आसीद् अन्तरिक्षम् शीर्ष्णो द्यौः सम-वर्तत।
पद्भ्याम् भूमिर दिशः श्रोत्रात् तथा लोकान्ऽ अकल्पयन्॥13॥

यत् पुरुषेण हविषा देवा यज्ञम् ऽतन्वत।
वसन्तो अस्य आसीद् आज्यम् ग्रीष्मऽ इध्मः शरद्धविः॥14॥

सप्तास्या आसन् परिधय त्रिः सप्त समिधः कृताः।
देवा यद् यज्ञम् तन्वानाः अबध्नन् पुरुषम् पशुम्॥15॥

यज्ञेन यज्ञम ऽयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्य आसन्।
ते ह नाकम् महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः॥16॥

वाद्य यंत्र पूजन विधि –

वाद्य संगीत मनुष्य की उदात्त भावनाओं और उसकी ह्रदय तरंगों को व्यक्त करने के सहयोगी साधन हैं। इसलिए इन साधनों का पूजन करना उनके प्रति अपनी हार्दिक श्रद्धा भावना प्रकट करना है। स्मरण रहे स्थल और जड़ पदार्थ भी चेतना एक तरंगों से स्वर लहरियों के संयोग से सूक्ष्म रूप में एक विशेष प्रकार की चेतना से युक्त हो जाते हैं, इसलिए वाद्य केवल स्थूल वस्तु नहीं, प्रत्यूत उनमें मानव हृदय की सी तरंगों को समझकर उनकी पूजा करनी चाहिए। चर्म रहित जो वाद्य यंत्र उपलब्ध हो उन्हें एक चौकी पर सजा कर रखे। पुष्प अक्षत आदि समर्पित कर पूजन करें।
ॐ सरस्वती योज्याम् गर्भमन्तरश्विभ्याम् पत्नी सुकृतं बिभर्ति।
अपा गूंग रसेन वरुणो न साम्नेद्र गूंग श्रिये जनययन्नप्सु राजा।।

 बसंत पंचमी क्यों और कैसे मनाया जाता है।

मयूर पूजन मंत्र एवम् विधि –

मयूर मधुर गान सौंदर्य तथा प्रसन्नता का स्वरूप उत्कृष्ट प्रतीक वाणी है। मनुष्य मयूर की भांति अपनी वाणी व्यवहार तथा जीवन को मधुरता युक्त आनंददाई बनाए इसके लिए मयूर की पूजा की जाती है। Saraswati के चित्र में अंकित अथवा प्रतीक रूप में स्थापित मयूर का पूजन करें अक्सर चित्रों में मयूर का चित्र होता ही है यदि कहीं ऐसा चित्र बना हो तो मयूर पंख को पूजा के लिए प्रयुक्त कर लेना चाहिए। निम्न मंत्र से मयूर का पूजन किया जाए-
ॐ मधु वाताsऋतायते, मधु क्षरन्ति सिंधव:। माध्वीर्न: सन्त्वोषधी:।।

संपूर्ण बसंत Saraswati पूजन विधि –

पुष्प प्रसन्नता उल्लास और नवजीवन के खिलखिलाते रूप के मूर्ति प्रतीक होते हैं, उनमें राम प्रकृति की गोद में पुष्पों की महक उनका हंसना खेलना घूमना मनुष्य के लिए उल्लास प्रभु लता का जीवन बिताने के लिए मुक्त संदेश है। इसी संदेश को ह्रदय गम करने जीवन में उतारने के लिए पुष्प का पूजन किया जाता है। खेतों में सरसो पुष्प को जो बसंती रंग के अथवा बाग आदि से फूल पहले ही मंगवा कर एक गुलदस्ता बना लेना चाहिए। बसंत का प्रतीक मानकर इनका पूजन करना चाहिए।

ॐ बसंताय कपिइय्ज लानालभते ग्रीष्माय कलविदङ्कान्,
वर्षाभ्यस्ति इत्तरी एइछरदे, वर्त्तिका हेमन्ताय ककराइच्छ शिराय वीककरान्।।

संकल्प :

(दाहिने हाथ में जल अक्षत और द्रव्य लेकर निम्न संकल्प मंत्र बोले 🙂

ऊँ विष्णु र्विष्णुर्विष्णु : श्रीमद् भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्त्तमानस्य अद्य श्री ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीय परार्धे श्री श्वेत वाराह कल्पै वैवस्वत मन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे युगे कलियुगे कलि प्रथमचरणे भूर्लोके जम्बूद्वीपे भारत वर्षे भरत खंडे आर्यावर्तान्तर्गतैकदेशे —— नगरे —*— ग्रामे वा बौद्धावतारे ……नाम संवत्सरे श्री सूर्ये…..’ …. ऋतौ महामाँगल्यप्रद मासोत्तमे शुभ….. मासे…. पक्षे ….. तिथौ ….वासरे …. नक्षत्रे … योगे…. करणे… राशि …. चन्द्रे …. राशि ….सूर्य …राशि स्थिते देवगुरौ शेषेषु ग्रहेषु च यथा यथा राशि स्थान स्थितेषु सत्सु एवं ग्रह गुणगण विशेषण विशिष्टायाँ चतुर्थ्याम्‌ शुभ पुण्य तिथौ — +– गौत्रः –++– अमुक शर्मा, वर्मा, गुप्ता, दासो ऽहं मम आत्मनः नामाहं बसंतपर्वणि नवसृजन ईश्वरी योजनाम् अनुसरन् आत्मनिर्माण-परिवारनिर्माण-समाजनिर्माणादिषु त्रिविध साधनासु नियम निष्ठा पूर्वकम् सहयोग प्रदानाय संकल्पम् अहम् करिष्ये।

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