swami vivekananda का सम्पूर्ण जीवन परिचय।

swami vivekananda

swami vivekananda जी कोई परिचय के मोहताज नहीं है। क्योंकि महान आत्माओं का कोई परिचय नहीं होता है। इनकी बारे में मैं एक चीज बस कहूंगा यह वह इंसान थे जिन्हें पूरी दुनिया फॉलो करती है। और भविष्य में भी करती रहेगी। बहुत बड़े बड़े महान लोगों ने भी इनसे प्रेरणा प्राप्त की है। चाहे सुभाष चंद्र बोस हो चाहे नरेंद्र मोदी हो चाहे लाल बहादुर शास्त्री जी हैं चाहे महात्मा गांधी हो चाहे ग्रेट साइंटिस्ट टेस्ला जी हो इनकी बहुत लंबी लिस्ट है।

जिन्होंने Theosophical_Society पुण्य आत्मा से प्रेरणा प्राप्त की। हर व्यक्ति ने इनसे प्रेरणा प्राप्त की है। Swami Vivekananda जी पहले व्यक्ति थे जिन्होंने हमारे वेदों की ताकत, वेदांत की ताकत उपनिषदों की ताकत, पुराणों की ताकत ज्योतिषी की ताकत यथार्थता की ताकत का ज्ञान संपूर्ण विश्व में फैलाया। और अपने ज्ञान से सभी के दिल में जगह बनाई।

जी ने हिंदुत्व की वास्तविक परिभाषा दी और इसकी ताकत से भारत के साथ विश्व को परिचय कराया। उन्होंने साबित कर दिया कि जो भारत देश है वह सही में सबका गुरु है विश्व गुरु है। पूरी दुनिया में भारत के आध्यात्मिक क्षेत्र का परचम उन्होंने लहराया। ऐसे पूजनीय थे हमारे स्वामी विवेकानंद जी।
हम इस लेख ने यह जाने का प्रयास करेंगे कि एक नरेंद्र कैसे स्वामी विवेकानंद जी बने उन्होंने हिंदुत्व को कैसे परिभाषित किया विश्व धर्म सम्मेलन में उनके व्याख्यान को क्या स्थान मिला वह भारत के विषय में स्वामी विवेकानंद जी का क्या मत था? इन सब की चर्चा हम करेंगे।

आज कई महानुभावों द्वारा हिंदुत्व की बात कही जाती है, लेकिन क्या जो बात उनके द्वारा कही जा रही है वह कितना सच है स्वामी जी साक्षात भगवान से बात करते थे और फाइनली वर्ल्ड कॉन्फ्रेंस सबसे बड़ी अचीवमेंट कैसे प्राप्त की। विश्व धर्म सम्मेलन एक ऐसा मंच था जिसे भारत के ज्ञान का प्रकाश संपूर्ण विश्व में फैल गया।
इनकी मां बहुत शिव भक्ति मे लीन रहती थी और उन्होंने प्रार्थना की थी कि मुझे बहुत ही प्यारा बालक दें भगवान शिव सपने में आकर उन्हें आश्वासन भी दिए थे की चिंता ना करें हम आ रहे हैं।

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swami vivekananda

भगवान के आशीर्वाद से Swami Vivekananda का जन्म हुआ।

swami vivekananda जी का जन्म 12 जनवरी 1863 ई को मकर संक्रांति के दिन जन्म कलकत्ता में होता है। सूर्य उदय के साथ 6:33 में इनका जन्म होता है। इनके पिता विश्वनाथ एक अटॉर्नी होते हैं, इनका पूरा परिवार मानवता के लिए समर्पित था। इनके पिता विश्वनाथ जी काफी अनुशासित थे और इनका ध्यान अति रखते थे।  इनकी माता इनके विपरीत वह वाले से युक्त थे और बालक की हमेशा देखभाल करते थे, परिवार में हमेशा रामायण महाभारत और पुराणों से हमेशा लगाव था।

नरेंद्र बचपन से ही सभी आध्यात्मिक पुस्तकों से लगाव रखते थे, इनका दिल बहुत ही कोमल था और कई लोगों का मजाक उड़ाते और आनंद लेते थे। एक समय की बात है एक साधु के सानिध्य में आकर बहुत कम उम्र में घर परिवार छोड़कर वह भगवान की खोज के लिए निकल जाते हैं। वे जब भी किसी गरीब को देखते थे तो जो भी उनके पास होता था यथाशक्ति उन्हें अर्पित करते थे। यह देखकर इनके माता-पिता ने इन्हें समझाया और नहीं समझने पर कई बार इन्हें बंद भी कर दिए कमरे में। वे यहां नहीं रुकते थे बल्कि खिड़की के माध्यम से अगर कोई गरीब दिख जाता तो वह जो भी सामान होता था दे देते थे।

इस तरह से हमारे swami vivekananda जी इनका पूरा नाम नरेंद्र नाथ दत्त था। अपने कर्मों के माध्यम से swami vivekananda बने। एक खास बात यह होती है कि जो ईश्वर और परमात्मा के निकट होते हैं उन्हें प्रकृति से बहुत प्रेम होता है। स्वामी विवेकानंद जी भी ऐसे ही थे वह अपने घर में बहुत से पालतू जीव जंतुओं एवं पशुओं को आश्रय देते थे। वे सभी पालतू जानवरों का बहुत स्नेह और प्रेम से लालन पालन करते थे। शायद स्वामी विवेकानंद जी को स्वयं परमात्मा ने आध्यात्मिक दर्शन के क्षेत्र में कार्य करने के लिए उनका चयन किया था। एक लक्ष्य सपनों के माध्यम से भगवान ने दिया।

इनके सफर में दो उद्देश्य वाले व्यक्ति दीखते थे एक ऐसा व्यक्ति बन जाएँ जो शादी विवाह करके संपन्न जीवन वितरित कर रहा है दूसरा उनके मन में आता है कि सब कुछ छोड़कर सन्यासी बन जाना चाहिए और समाज देश राष्ट्र और विश्व के हित के लिए कार्य करना चाहिए बहुत ही कम समय में इन्हें ज्ञान की अनुभूतियां होना प्रारंभ हो गया था। यह बहुत ही प्रतिभावान बच्चे थे। इनका दिमाग बहुत ही तेज था और यह शिक्षकों के बहुत प्रिय थे। यह स्कूल में होने वाली हर एक गतिविधियों में चाहे वह खेल हो सांस्कृतिक कार्यक्रम हो परीक्षा हो सभी में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने के लिए हमेशा तत्पर रहते थे। इनका बचपन अच्छा खासा बीता शुरू में यह ज्यादा धार्मिक नहीं थे। स्कूल के बाद यह प्रेसिडेंसी कॉलेज में एडमिशन लेते हैं जहां से बड़े बड़े लोग अध्ययन किए थे। यह ब्रह्म समाज से मन से जुड़े हुए थे और उसके मान्यताओं को स्वीकार करते थे। इन सबके बावजूद इनका मन ये सब मानने को तैयार नहीं होता था।

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हिंदुइज्म आखिर है क्या?

आज हम जो हिंदुत्व देख रहे हैं वह वास्तविक हिंदुत्व नहीं हैं मूर्ति की पूजा करना यह तस्वीर की पूजा करना ही केवल हिंदुत्व नहीं बल्कि इसका व्यापकता विशाल विचार है। संपूर्ण अंतरिक्ष या स्पेस ब्रह्मांड से बना है इस ब्रह्मांड से आत्मा की उत्पत्ति होती है जो एक एनर्जी होती है। उसी ब्रह्मांड से निकली ऊर्जा से मनुष्य और अन्य जीव-जंतुओं की उत्पत्ति होती है। वास्तव में यही ऊर्जा हमारे अंदर है। मानव का शरीर पंच तत्वों से बना है इसी में यह ऊर्जा प्रवेश करती है। इसी के साथ माया रूपी तत्व शरीर में प्रवेश करते हैं। मानव भौतिक वस्तुओं में पुष्कर मूल हंसकर मॉल तत्व अर्थात मोक्ष की प्राप्ति को भूल जाता है।

हमारा जन्म उसी ब्रह्मांड से हुआ है और उसी में विलीन होना एक लक्ष्य है जिसे हम मोक्ष के रूप में जानते हैं। सामान्य तौर पर मोक्ष पाने के दो ही प्रमुख कारक हैं पहला अद्वैत वेदांत इस वेदांत में अपने आप को एक बूंद की भांति समझने की बात कही गई है, और यह गुण सागर में जाकर मिल जाएगी ना ही मौक्ष की प्राप्ति है। अर्थात आप कहां पर सागर में मिल जाओगे इसे कोई नहीं जानता। लेकिन यह निश्चित है कि आज आपकी आत्मा उस परमात्मा से एक न एक दिन अवश्य मिलेगी।

दूसरा होता है दांत वेदांत इसमें हरे पेड़ पर एक हरा तोता बैठा है उस हरे पेड़ में आप समा जाओगे लेकिन यह नहीं पता चलेगा कि यहां कोई तोता बैठा है Swami Vivekananda द्वैत वेदांत पर जोर देते थे अर्थात हम एक बूंद है और अंत में हमें सागर में मिल जाना है। अब प्रश्न यह उठता है कि हम उस परमात्मा में मिलेंगे कैसे वास्तव में यह एक चक्र है जो क्रमशः कर्म के अनुसार चलती रहेगी। यह एक माया है और हिंदू धर्म में ऐसी मान्यता है कि लाखो जन्म हमारा होता है तब जाकर मोक्ष की प्राप्ति होती हैं। कुल 6 प्रकार के प्रजातियों में हमारा जन्म होता है। इस टाइम का कथन भी यही है कि ऊर्जा ना तो पैदा होती है ना नष्ट होती है बस उसका स्वरूप बदलता है यह तथ्य हमारे वेदों में हजारों साल पहले लिखित रूप में मिलता है।

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मोक्ष पाने के तीन ही आधार हैं।

पहला होता है सच्चितानंद जिसका अर्थ होता है सत्य अर्थात सत्य की खोज के लिए जाएं।  और दूसरा  चित्रकारी, अर्थ होता है कि आप अपने अंदर ही भगवान की खोज करें ध्यान योग और तब के माध्यम से। तीसरा मार्ग आनंद का है जिसमें आप किसी की मूर्त या अमूर्त चित्र बना लीजिए और उन्हें का ध्यान करें पूजा करें। इसे आप परमात्मा के को जानने के और करीब आ जाते हैं और आप मोक्ष के योग्य होने रखते हैं।

हम इसीलिए मूर्तियों की पूजा करते हैं आप जितने चाहे उतने मूर्तियां बना लो आपके मन को एकाग्र करने के लिए और उस परमात्मा से आत्मा को मिलाने के लिए यह एक माध्यम मात्र है जिसका उद्देश्य अति व्यापक है। इसी ध्यान के माध्यम से आप ईश्वर में विलीन हो सकते हैं अर्थात मोच प्राप्त कर सकते हैं। यह तीनों आधार सत चित आनंद यह भगवान शिव के त्रिशूल के रूप में है ऐसी मान्यता है यह तीनों चीजें अंत में त्रिशूल के समान मिल जाते हैं। भगवान शिव के हाथ में जो डमरु है वह ब्रह्मांण्ड की एनर्जी होती है जब डमरु बसता है तो संसार का जन्म होता है और विनाश भी होता है यह क्रम सतत जारी रहता है।

यही हिंदुत्व की आधारभूत दर्शन है। हिंदुत्व की यह पहचान सर्वप्रथम रामकृष्ण द्वारा की गई जो आगे चलकर Swami Vivekananda जी को रामकृष्ण द्वारा बताई गई यही तत्व ज्ञान को जानकर Swami Vivekananda जी आगे चलकर संपूर्ण विश्व को इसकी जानकारी दी और हिंदुत्व की वास्तविक ज्ञान को प्रकाश में लाया। महाभारत और रामायण सर्वप्रथम वेद, उपनिषद्, पुराण का निर्माण हुआ। हिंदुत्व का मुख्य उद्देश्य कर्म पर आधारित है अर्थात आपका कर्म ही मोक्ष का कारण बनेगा। यही हिंदुत्व की केंद्रीय तत्व है।

रामकृष्ण परमहंस जी को बचपन से ही ऐसे दिव्य दर्शन स्वप्न के माध्यम से होने लगे थे और वह परमात्मा की खोज के लिए सदा जिज्ञासु रहते थे ध्यान तब योग इन्हें शुरू से ही आकर्षित करते करता था हमेशा ध्यान में ही रहा करते थे।  वह घंटों तक भगवान में जुड़ने का प्रयास करते हैं अंततः मां काली इन को दर्शन देती हैं। एक बार स्वप्न में नारायण भगवान उनके पास आकर कहते हैं कि मैं अब अब अवतरण लेने वाला हूं। वास्तव में मन अत्यंत शक्तिशाली है, इस मन से हम संपूर्ण ब्रह्मांड को प्रभावित कर सकते हैं।  इतनी शक्ति हैं हमारे मन की शक्ति में हम अपने दिमाग का 10% भी प्रयोग नहीं करते हैं अगर हम संपूर्ण मन की शक्ति का प्रयोग करें तो हम स्वयं ब्रह्म या परमात्मा का अंग बन जाएंगे।

इसीलिए मन को एकाग्र करने के लिए साधु संत हमेशा ध्यान मग्न रहते हैं यह भारतवर्ष की पहचान है। ध्यान की इस महिमा को जानकर आप सभी कम से कम अपने लिए 5 से 10 मिनट निकाले और संपूर्ण शक्ति को एकाग्र कर ध्यान लगाने का प्रयास करें और अपने आपसे प्रश्न करें जिन प्रश्नों का उत्तर आपको प्राप्त नहीं होता। रामकृष्ण परमहंस मन की एकाग्रता और ध्यान की ताकत को अच्छी तरह जानते थे। रामकृष्ण परमहंस के ध्यान के समय उन्हें एक छोटा सा बालक संत के वेश में दिखाई देते हैं और वह बालक उनसे कहता है कि आप अभी तक हमें नहीं खोज पाए हैं जल्दी खोजें।

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स्वामी जी की सम्पूर्ण जीवन परिचय।

जब swami vivekananda अपने गुरु रामकृष्ण परमहंस से मिलते हैं –

तो परमहंस जी को यह आभास हो जाता है कि यह वही बालक का प्रतिरूप है जो मुझे ध्यान करते समय दिखाई देता था यही वह इंसान है। रामकृष्ण परमहंस swami vivekananda जी को अपने पुत्र के समान मानने लगते हैं और उन्हें जब भी देखते या छूने का प्रयास करते वह ध्यान में मग्न हो जाते थे। एक समय गुरु और शिष्य मैं शास्त्रार्थ होता है कि वेद और वेदांत नहीं होते मुझे किसी भी प्रकार की पूजा नहीं करनी है वास्तव में उस समय वे वास्तविकता को नहीं जानते थे। कई बार रामकृष्ण परमहंस का उपहास भी Swami Vivekananda जी करते हैं कि वे भगवान से मिलवायेंगे! एक दिन सही में विराट परमात्मा के दर्शन स्वामी विवेकानंद को ध्यान के समय प्राप्त हो जाता है उन्हें ब्रह्मांड के अंदर ब्रह्मांड ब्रह्मांड के अंदर ब्रह्मांड इतना व्यापक लिए हुए दृश्य स्वामी विवेकानंद को दिखाई देते हैं। यह दर्शन रामकृष्ण परमहंस के द्वारा Swami Vivekananda के मन को केंद्रित करने के बाद दिखाई देते हैं।

swami vivekananda के पिताजी की मृत्यु।

कुछ समय बाद Swami Vivekananda के पिताजी की मृत्यु हो जाती है अचानक पूरे परिवार में गरीबी व भुखमरी छा जाती है, पहनने के लिए कपड़े तक नहीं होते कभी-कभी एक समय ही भोजन उपलब्ध हो पाता था, उनके कई मित्र उन्हें आमंत्रित करते हैं कि आप हमारे साथ खा लीजिए परंतु Swami Vivekananda जी मना कर देते हैं। वे कहते हैं कि मेरा पूरा परिवार भूखा है तो मैं कैसे भोजन करूं? खाने के लिए पैसा नहीं है क्या करोगे माता भुनेश्वरी भी स्वामी विवेकानंद जी से कहती हैं कि तुम भगवान के प्रार्थना कर रहे हो और यहां देखो हम भूख से व्याकुल हैं विवश होकर भगवान की आराधना करना छोड़ देते हैं,

और कहते हैं कि यह सब बेकार है भगवान और ईश्वर कुछ नहीं होता। वे काम के लिए फटे कपड़े पहन कर इधर-उधर घूमते रहते हैं। ने भगवान को बार-बार कहते हैं कि आप मुझे दर्शन दिए लेकिन पूरे घर में गरीबी आ गई है। एक समय वह आराम कर रहे होते हैं उसी समय उनके मन में एक सपना आता है जिसमें परमात्मा होते हैं और परमात्मा के अंदर परमात्मा परमात्मा के अंदर परमात्मा ऐसे दर्शन उन्हें होने लगते हैं। तवे एकदम से उठते हैं और कहते हैं कि अब यह सब छोड़कर मैं वास्तविक भगवान की खोज के लिए निकलूंगा।

उस समय से उन्हें वास्तविक ज्ञान की प्राप्ति होने लगती है। Swami Vivekananda रामकृष्ण गुरु के पास जाते हैं तब रामकृष्ण जी उन्हें मां काली की आराधना करने के लिए प्रेरित करते हैं। पहले वे सॉन्ग काली माता को नहीं मानते थे लेकिन बाद में मानने लगे वे अपने मन को एकाग्र करने लगे और कई-कई घंटे और दिन तक मन को एकाग्र करके ध्यान लगाए रहते हैं। वह परमात्मा से प्रश्न भी करते हैं कि मुझे आपने गरीबी क्यों दिखाई मुझे ऐसे हालात मैं क्यों छोड़ दिया ? तब भगवान कहते हैं कि अगर मैं यह भौतिक चीजें अगर उपलब्ध करा देता तो तुम वास्तविक ज्ञान की प्राप्ति वह मेरे शरण में नहीं आ पाते। हिंदू धर्म में एक परंपरा यह भी है कि अनंत के आगे भी अनंत ही है।

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स्वामी जी की सम्पूर्ण जीवन परिचय।

सच्ची शिक्षा –

शिक्षा मनुष्य में पहले से ही पूर्णता का प्रकटीकरण है। शिक्षा क्या है? क्या यह पुस्तक सीखना है? नहीं। क्या यह विविध ज्ञान है? वह भी नहीं। वह प्रशिक्षण जिसके द्वारा इच्छा की वर्तमान और अभिव्यक्ति को नियंत्रण में लाया जाता है और फलदायी हो जाता है, शिक्षा कहलाता है।

शिक्षा वह जानकारी नहीं है जो आपके मस्तिष्क में डाली जाती है और वह जीवन भर चलने वाली, अपवित्र, आपकी पूरी जिंदगी चलती है। हमारे पास जीवन निर्माण, आदमी बनाने, विचारों को आत्मसात करने वाला चरित्र होना चाहिए। यदि आपने पांच विचारों को आत्मसात किया है और उन्हें अपना जीवन और चरित्र बनाया है, तो आपके पास किसी भी ऐसे व्यक्ति की तुलना में अधिक शिक्षा है जो पूरे पुस्तकालय को दिल से पाया है।

ठीक है, आपको लगता है कि एक आदमी शिक्षित था यदि केवल वह कुछ परीक्षाओं को पास कर सकता है और अच्छे व्याख्यान दे सकता है। वह शिक्षा जो आम लोगों को जीवन के संघर्ष के लिए खुद को लैस करने में मदद नहीं करती है, जो चरित्र की ताकत, गति परोपकारिता और एक शेर की हिम्मत को सामने नहीं लाती है, क्या नाम के लायक है? वास्तविक शिक्षा वह है जो किसी को अपने पैर को खड़ा करने में सक्षम बनाती है। अब आप जो शिक्षा कह रहे हैं, वह स्कूल और कॉलेज हैं, जो केवल आपको अपंगों की दौड़ बना रही है, आप मशीनों की तरह काम कर रहे हैं, और जेलिफ़िश अस्तित्व में रह रहे हैं।

स्वामी विवेकानंद जी की प्रमुख दार्शनिक विचार सत चित आनंद पर आधार की जो हिंदुत्व व हिंदू धर्म का आधार है वे सत चित आनंद के माध्यम से ही भगवान को समझने लगते हैं और उन्हीं में ही खो जाते हैं। उनके जीवन में इतनी कठिनाई आने के बाद भी वे अपने गुरु के बताए हुए रास्ते पर चलते हैं और भगवान की प्राप्ति की खोज में लीन होने लगते हैं Swami Vivekananda जी का एक ही लक्ष्य था कि किस तरह भगवान की प्राप्ति की जाए।

वे रात दिन ध्यान में मग्न रहते थे वे कई कई दिन ध्यान में मांग में रहते थे उन्हें कई बार जगाना पड़ता था कई कई बार Swami Vivekananda जी को भी द्वंद का सामना करना पड़ता था कि वे आध्यात्मिक की ओर जाएं की भौतिकता की ओर। वे जो कुछ खाने को मिलता स्वीकार कर लेते थे केवल एक कपड़े में ही वे अपना जीवन व्यतीत कर रहे थे। स्वामी विवेकानंद संपूर्ण भारत यात्रा इसी प्रकार करते हैं वे छुआछूत जैसी सामाजिक बुराइयों से काफी ग्रहण करते थे उस समय भारत की हालत बहुत खराब थी व्हिच इस सब से चिंतित भी रहते थे। स्वामी जी ध्यान को ही अपना जीवन बना लिया था और अंततः भगवान की प्राप्ति होती है। और एक नरेंद्र बालक Swami Vivekananda बन जाते हैं।

जब वह पश्चिमी देश पहुंचते हैं तो वे फूट-फूटकर रोते हैं। उन्हें दुख होता है कि इन देशों में कितनी संपन्नता है जहां एक व्यक्ति लाखों करोड़ों रुपए अपने ऊपर खर्च कर रहा है। अमीर लोग पालतू जानवरों पर खर्च कर देते हैं वहीं भारत देश के नागरिक दो वक्त की रोटी भी उपलब्ध नहीं हो पाती। भारत के लोग भूखे हैं कपड़े पहनने के लिए वस्त्र नहीं है फिर शिक्षा तो दूर की बात है यह सब देखकर उन्हें बहुत अंतरमन दुख से व्याकुल हो जाता है और वह पुनः बहुत रोते हैं। भावनात्मकता होना बड़े लोंगों की निशानी है मानवता की पहचान है भावनात्मक रूप से मजबूत होना। भगवान को पाने के लिए एबी साधन है।

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स्वामी जी की सम्पूर्ण जीवन परिचय।

रामकृष्ण परमहंस Swami Vivekananda को जो भी ज्ञान था सब दे देते हैं-

कुछ समय बाद रामकृष्ण परमहंस जी को यह आभास होता है कि उनका जीवन के दिन कम ही बचे हैं। वे Swami Vivekananda जी को बुला कर कहते हैं कि मेरे पास जितना ज्ञान था मैंने आपको दे दिया अब मेरे पास कुछ भी देने के लिए कोई ज्ञान नहीं बचा। स्वामी विवेकानंद जी को उनके गुरु कहते हैं कि मेरी आखिरी इच्छा यही है कि भारतवर्ष के समस्त युवाओं को तुम जगाने का प्रयास करो।

इतने वर्षों में जो भी ज्ञान तुमको प्राप्त हुआ है वह युवाओं को प्रदान करो। सभी युवाओं को हिंदुत्व की ताकत से परिचित कराओ। युवाओं को नींद से जगाओ ताकि वे देश के काम आ सके। यही मैं तुमसे चाहता हूं। रामकृष्ण परमहंस जी कहते हैं कि अब मैं खुशी-खुशी इस मृत्युलोक को छोड़ सकता हूं। और कुछ दिनों बाद वे एक दिन समाधि को ग्रहण कर लेते हैं। राम कृष्ण परमहंस ब्रह्म में लीन हो जाते हैं। स्वामी विवेकानंद यह जानकर अत्यधिक रोते हैं और दुखी होते हैं। उनके गुरु ही उनके सहारा थे। अलग सी पावर वह महसूस करते हैं कि मुझे कुछ नहीं हो सकता। वे समाज के लिए बहुत सोचते हैं और समाज को आगे ले जाने के लिए वह उसकी खोज में निकल जाते हैं।

रामकृष्ण परमहंस जी के मृत्यु के बाद उनके अनुयायी स्वामी विवेकानंद जी को एक आश्रय प्रदान करते हैं स्वामी विवेकानंद संत होने के कारण मैं ऐसी अवस्था में नहीं रह सकते थे जैसा वातावरण उस स्थान पर था। अंततः स्वामी विवेकानंद अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए भारत भ्रमण का विचार करने लगते हैं। अमित शाह व अंतिम निर्णय लेते हैं कि भारतवर्ष के सभी युवाओं को जगाने का समय आ गया है उन्हें उनकी ताकत से परिचय कराना अत्यंत आवश्यक हो गया है। आध्यात्मिक ज्ञान संपूर्ण भारतवर्ष में फैलाना ही मेरा लक्ष्य होगा इस प्रकार भी संकल्प लेते हैं।

स्वामी विवेकानंद जी का मत था कि धर्म को राजनीति से अलग करना बहुत ही कठिन कार्य है। कई दार्शनिकों का विचार है कि यदि धर्म ना हो तो राजनीति बहुत अच्छे से कार्य कर सकेगी परंतु स्वामी जी का विचार था कि धर्म से ही राजनीति है धर्म का एक भाग ही राजनीति है राजनीति से धर्म को अलग नहीं किया जा सकता धर्म से ही हमारा अस्तित्व है। यह सभी धर्मों की बात करते हैं वे कहते हैं कि सभी धर्म भगवान की बातें करते हैं भगवान हमेशा सकारात्मक होते हैं सच्चिदानंद होते हैं अगर हम यह बातें समाज के ज्ञान में लाएंगे तो यह समाज के लिए ही लाभदायक होगा। लोग अगर आध्यात्मिक होंगे तो समझदार भी होंगे। और अगर लोग समझदार होंगे तो देश अच्छा कार्य करेगा। स्वतः ही विकास होने लगेगा।

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swami vivekananda की सम्पूर्ण जीवन परिचय।

Swami Vivekananda स्पीच 11 Sep 1893,

अमरीकी भाइयों और बहनों, आपने जिस स्नेह के साथ मेरा स्वागत किया है उससे मेरा दिल भर आया है. मैं दुनिया की सबसे पुरानी संत परंपरा और सभी धर्मों की जननी की तरफ़ से धन्यवाद देता हूं। सभी जातियों और संप्रदायों के लाखों-करोड़ों हिंदुओं की तरफ़ से आपका आभार व्यक्त करता हूं।
मैं इस मंच पर बोलने वाले कुछ वक्ताओं का भी धन्यवाद करना चाहता हूं जिन्होंने यह ज़ाहिर किया कि दुनिया में सहिष्णुता का विचार पूरब के देशों से फैला है।

मुझे गर्व है कि मैं उस धर्म से हूं जिसने दुनिया को सहिष्णुता और सार्वभौमिक स्वीकृति का पाठ पढ़ाया है। हम सिर्फ़ सार्वभौमिक सहिष्णुता पर ही विश्वास नहीं करते बल्कि, हम सभी धर्मों को सच के रूप में स्वीकार करते हैं।

मुझे गर्व है कि मैं उस देश से हूं जिसने सभी धर्मों और सभी देशों के सताए गए लोगों को अपने यहां शरण दी। मुझे गर्व है कि हमने अपने दिल में इसराइल की वो पवित्र यादें संजो रखी हैं जिनमें उनके धर्मस्थलों को रोमन हमलावरों ने तहस-नहस कर दिया था और फिर उन्होंने दक्षिण भारत में शरण ली। मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूं जिसने पारसी धर्म के लोगों को शरण दी और लगातार अब भी उनकी मदद कर रहा है।

मैं इस मौके पर वह श्लोक सुनाना चाहता हूं जो मैंने बचपन से याद किया और जिसे रोज़ करोड़ों लोग दोहराते हैं। ”जिस तरह अलग-अलग जगहों से निकली नदियां, अलग-अलग रास्तों से होकर आखिरकार समुद्र में मिल जाती हैं, ठीक उसी तरह मनुष्य अपनी इच्छा से अलग-अलग रास्ते चुनता है। ये रास्ते देखने में भले ही अलग-अलग लगते हैं, लेकिन ये सब ईश्वर तक ही जाते हैं।

मौजूदा सम्मेलन जो कि आज तक की सबसे पवित्र सभाओं में से है, वह अपने आप में गीता में कहे गए इस उपदेश इसका प्रमाण है। ”जो भी मुझ तक आता है, चाहे कैसा भी हो, मैं उस तक पहुंचता हूं। लोग अलग-अलग रास्ते चुनते हैं, परेशानियां झेलते हैं, लेकिन आखिर में मुझ तक पहुंचते हैं।’

सांप्रदायिकता, कट्टरता और इसके भयानक वंशजों के धार्मिक हठ ने लंबे समय से इस खूबसूरत धरती को जकड़ रखा है। उन्होंने इस धरती को हिंसा से भर दिया है और कितनी ही बार यह धरती खून से लाल हो चुकी है। न जाने कितनी सभ्याताएं तबाह हुईं और कितने देश मिटा दिए गए।

यदि ये ख़ौफ़नाक राक्षस नहीं होते तो मानव समाज कहीं ज़्यादा बेहतर होता, जितना कि अभी है। लेकिन उनका वक़्त अब पूरा हो चुका है। मुझे उम्मीद है कि इस सम्मेलन का बिगुल सभी तरह की कट्टरता, हठधर्मिता और दुखों का विनाश करने वाला होगा। चाहे वह तलवार से हो या फिर कलम से।

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जब Swami Vivekananda एक दलित के परिवार में भोजन करने गए।

स्वामी विवेकानंद देश के आध्यात्मिक विकास के लिए भारत भ्रमण का निश्चय करते हैं वे इस दौरान छुआछूत जैसे कुप्रथा से दुखित होते हैं। वे मानव मानव के बीच किसी भी प्रकार का  भेदभाव के विरुद्ध थे। इसी संदर्भ में एक बार एक घटना घटित होती है एक समय स्वामी जी भ्रमण की ओर निकले हुए थे। Swami Vivekananda इस दौरान कई दिनों से भूखे होते हैं, उसी समय एक निम्न वर्ग का एक व्यक्ति उनके पास संकोच वश आता है और बड़ी हिम्मत कर स्वामी जी से अपने घर में भोजन कराने के लिए निवेदन करता है।

यह सुनकर स्वामी विवेकानंद जी कहते हैं कि हम क्यों नहीं खाएंगे आपके साथ ऐसा कह कर अपने सभी अनुयायियों के साथ उनके घर जाकर प्रेम से भोजन ग्रहण करते हैं। अपनी यात्रा के दौरान वे ज्यादातर गरीबों और निम्न तबकों के साथ रहना पसंद करते थे। उनको भी आध्यात्मिक उन्नति की ओर जाने के लिए प्रेरित करते हैं क्योंकि वे मानते थे कि हर इंसान भगवान का ही रूप है इसलिए हमको उसी नजर में से देखनी चाहिए।

आध्यात्मिक रूप से विश्व गुरु भारत वर्ष का परिचय संपूर्ण विश्व में पुनः कराने हेतु Swami Vivekananda विश्व भ्रमण का निश्चय कर संयुक्त राज्य अमेरिका में होने वाले विश्व धर्म सम्मेलन में भाग लेने का विचार करते हैं। वे ध्यान के समय भगवान से बातें करते हैं और उनसे पूछते हैं की वह वहां जाएं तो भगवान कहते हैं कि हे शिष्य तुम्हें अवश्य वहां जाना चाहिए और सत्य से सभी को अवगत कराना ही लक्ष्य होना चाहिए। इसके लिए धन की आवश्यकता होती है जिसे खेतड़ी क्षेत्र के राजा द्वारा वहन करने का प्रस्ताव किया जाता है वे ही स्वामी विवेकानंद जी की उपाधि उन्हें प्रदान करते हैं।

 

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swami vivekananda विश्व धर्म सम्मेलन में भाग लेने के लिए जुलाई में अमेरिका पहुंचते हैं-

वहां की उन्नति और विकास को देखकर उन्हें एक अलग तरह का अनुभव होता है और खुशी भी होती है। जुलाई 1993 में होने वाली विश्व धर्म सम्मेलन का समय सितंबर में प्रस्तावित हो जाता है। स्वामी जी एक निश्चित धनराशि लेकर आए हुए होते हैं क्योंकि उन्हें मालूम था कि कुछ दिन में ही वापसी करनी है। पैसे कम पड़ जाते हैं और उन्हें 2 महीने तक रुकना था। वे भारत में संपर्क स्थापित करने का प्रयास करते हैं परंतु संभव नहीं हो पाता।

वे theosophical society से सम्पर्क करने का प्रयास करते हैं। मदद के लिए तैयार हो जाते हैं परंतु वे चाहते है कि स्वामी जी थियोसॉफिकल सोसायटी की शिक्षा का प्रचार-प्रसार धर्म सम्मेलन में करें। स्वामी विवेकानंद क्षमा मांग लेते हैं स्वामी जी थियोसॉफिकल सोसायटी के विचारों से सहमत नहीं थे इसलिए प्रस्ताव स्वीकार नहीं करते। theosophical society के लोग भी स्वामी जी को सहायता देने से मना कर देते हैं। स्वामी जी को दुख होता है इसी समय अमेरिकन भी उनकी सहायता के लिए आते हैं। उनको अपने घर ले जाते हैं वे स्वामी जी का उचित सेवा करते हैं इसी समय उनसे सिस्टर निवेदिता से परिचय होता है जो विश्व धर्म सम्मेलन आयोजन समिति के सदस्य भी होती हैं।

इस सम्मेलन में भाग लेने के लिए कोई प्रशस्ति पत्र होना आवश्यक था स्वामी जी के पास यह नहीं था अतः निवेदिता जी स्वामी जी की सहायता करती हैं और उन्हें विश्व धर्म सम्मेलन में भाग लेने का अवसर प्राप्त होता है। जब यह विश्व धर्म सम्मेलन में 11 सितंबर 1993 ईसवी में बोलने जाते हैं तो सभी अपने अपने धर्म से संबंधित बातें सम्मेलन में करते हैं जब स्वामी विवेकानंद जी को बोलने का अवसर प्राप्त होता है तो वे थोड़ा घबराते हैं परंतु भगवान में ध्यान लगा कर अपने आप को स्थिर करते हैं जब यह स्पीच देते हैं उनका पहला शब्द होता है ब्रदर्स एंड सिस्टर्स ऑफ़ आमेरिकन्स यह सुनकर पूरे महासभा सभी खड़े होकर 2 मिनट तक तालियां गूंजने लगती हैं। उनका प्रभावशाली वक्तव्य सुनकर सभी मंत्रमुग्ध हो जाते हैं सभी बड़े अखबार उन्हें अपने मुख्य पृष्ठ पर स्थान देते हैं। स्वामी जी से कुछ लाभ प्राप्त हेतु जुड़ने लगते हैं। स्वामी विवेकानंद यह जानकर उनसे दूर हो जाते हैं। स्वामी जी अपने अनुयायी मार्गेट नोबेल (सिस्टर निवेदिता) के कहने पर उनके बाते मानते हैं।

स्वामी जी की सम्पूर्ण जीवन परिचय।

Swami Vivekananda विश्व धर्म सम्मेलन के बाद इंग्लैंड जाते हैं –

वहां वेदांत दर्शन की स्थापना करते हैं। जर्मनी में प्रसिद्ध इतिहासकार मैक्स मूलर से उनकी मुलाकात होती है। उनसे वेदांत से संबंधित काफी वार्तालाप होती है। वेश पूरे यूरोप के अधिकांश देशों में भ्रमण करते हैं और वेद वेदांत दर्शन को प्रसारित करते हैं कई जगह उनका विरोध भी होता है।

25 मार्च 1896 इसी में हावर्ड यूनिवर्सिटी में वेदांत के दर्शन से संबंधित प्रसिद्ध व्याख्यान वहां के छात्रों को देते हैं।
जब भारत आते हैं तो उनका किसी राजा के समान स्वागत होता है। स्वामी जी वेदांत दर्शन के ज्ञान को संपूर्ण भारत में पुनर्स्थापित करने हेतु निश्चय करते हैं। वे वेल्लूर में श्री रामकृष्ण मिशन की स्थापना करते हैं। कन्याकुमारी में भी आश्रम स्थापित करते हैं।

Swami Vivekananda जी ने अपनी मृत्यु के बाद सिस्टर निवेदिता को आध्यात्मिक विकास एवं वेदांत दर्शन के प्रचार प्रसार की जिम्मेदारी सौंपने की बात कही थी
स्वामी जी का कहना था कि वे 40 वर्ष के पूर्व ही समाधि ग्रहण कर लेंगे। स्वामी जी 4 जुलाई 1902 ई. को बेलूर मठ
में शाम के समय योग में लीन हो जाते हैं और 7:00 बजे वे अपने कक्ष में जाते हैं और सभी आने वालों को एकांत रहने की बात कहकर वे ध्यान में लीन हो जाते हैं रात 9:00 बजे जब अनुयायी उनके पास जाते हैं तो कोई प्रतिक्रिया नहीं देखते और वह जान जाते हैं कि स्वामी जी समाधि ग्रहण कर चुके हैं।

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