Teej – तीज-हरितालिका पूजन का महत्व,इतिहास,संपूर्ण विधि एवम् मन्त्र।

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(Teej) तीज व्रत भारतीय परम्पराओं एवम् मान्यताओं में महत्वपूर्ण व्रत है जिसे सम्पूर्ण भारतवर्ष की स्त्रियों द्वारा मनाया जाता है। हरितालिका व्रत पतिव्रता स्त्रियों एवं कुंवारी कन्याओं दोनों रखती हैं। हरितालिका व्रतों का व्रतराज है। इस व्रत के करने से स्त्रियाँ सौभाग्यवती एवम् सुहागिन होती हैं। इस महान उत्सव की सम्पूर्ण पूजन विधि एवम् कथा की जानकारी हम अपने प्रिय पाठकों तक पहुचाना हमारा मुख्य लक्ष्य है।

हरतालिका (Teej) व्रत का महत्व।

हरतालिका व्रत अर्थात तीज (Teej) का हमारे सनातन धर्म में विशेष महत्व रखता है, प्रत्येक स्त्रियों के लिए यह वर्ष में आने वाला एक महत्वपूर्ण व्रत है। अगर कोई स्त्री एक बार इसे करना प्रारंभ कर देती है तो उसे जीवनभर इस व्रत को करना होता है। यदि वह यह करने में सक्षम ना हो तो वह दूसरे के माध्यम से व्रत करा सकती है।

पतिव्रता स्त्रियां एवं अच्छे पति की चाह रखने वाली कन्याएं तीज (Teej) व्रत को बड़े ही नियम-धर्म से करती हैं और उन्हें इस व्रत पर बड़ी आस्था होती है। इस व्रत को करने से नारी सौभाग्यवती होती है। साथ ही घर मैं समृद्धि लाती है सुख, शांति, प्रेम, आदर, सत्कार, धनसंपदा हमेशा घर में बनी रहती है। उस घर में कभी अकाल मृत्यु नहीं होती। परिवार में कलह का कोई स्थान नहीं होता। नारियों का सम्मान होता है। समाज एवं देश में शांति बनी रहती है।

तीज (Teej) व्रत किस तिथि में मनाया जाता है?

भारतीय पंचांग के अनुसार हरतालिका व्रत प्रतिवर्ष भाद्र मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया के दिन हस्त नक्षत्र के समय यह सर्वोत्तम व्रत मनाया जाता है?

हरितालिका (Teej) व्रत का इतिहास:-

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भारतीय मान्यताओं, परंपराओं एवं पुराणों के अनुसार प्रथम बार यह व्रत माता पार्वती ने शिव महादेव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए यह सर्वश्रेष्ठ व्रत प्रारंभ किया था। इस तरह यह व्रत शिव भगवान ने सभी नर नारियों को बताया और धीरे-धीरे आम जनमानस तक प्रचलित हो गया।

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हरितालिका (Teej) व्रत आखिर नाम क्यों पड़ा।

इसके पीछे भी एक कहानी है। हरितालिका दो शब्दों से मिलकर बना है हरि का अर्थ अपहरण करना एवम् आलिका का अर्थ होता है सखी। जब माता पार्वती अपनी सखी के पास पहुंचते हैं तो सखी उनको हर कर वन की ओर ले जाती है इस प्रकार इसका नाम हरितालिका पड़ा जिसे हम तीज (Teej) के नाम से जानते हैं।

 हरितालिका (Teej) व्रत के दिन के जाने वाले नियम व पालन:-

  • हरितालिका व्रत के दिन अनेक नियमों का बातों का ध्यान रखा जाना जरूरी होता है।
  • व्रत के दिन प्रातः काल सूर्योदय के पहले उठकर नित्य क्रिया कर स्नान जरूर करें।
  • व्रत के दिन आपस में बुराइयां या किसी की भी बुराइयां करने से बचना चाहिए।
  • काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि माया से दूर रहकर व्रत करना चाहिए।
  • तीज (Teej) के दिन ब्रह्मचर्य का पालन अनिवार्य होता है।
  • व्रत के दिन परिश्रम युक्त कार्यों को अन्य दिनों के लिए छोड़ देना चाहिए।
  • गर्भवती एवम् रजस्वला स्त्रियों को व्रत नहीं करना चाहिए।
  • वे इसके स्थान पर संपूर्ण पूजन दूसरे व्रत धारी स्त्रियों से करवा सकती है।
  • तीज (Teej) व्रत की कथा के अनुसार नियमों एवम् मान्यताओं का पालन अनिवार्य है।

पूजन की महत्व,इतिहास,संपूर्ण विधि एवम् मन्त्र। 

क्या करें कि व्रत में प्यास कम लगे?

तीज (Teej) व्रत एक तप के समान होता है। इस दिन निर्जला व्रत रखा जाता है। भूख प्यास लगना आम बात होती है। इनके प्रभाव को कम करने के लिए कुछ उपाय हैं, जिन्हें 1 दिन पहले किया जाना चाहिए।

1. नींबू का शरबत ले जिसमें तुलसी व मिश्री शामिल हो।

2. सोने से पूर्व भीगा हुआ सौंफ का सेवन करें।

3. मीठा दही का सेवन भी कर सकते हैं।

4. मौसम अनुसार रस युक्त फलों का सेवन किया जा सकता है।

5. एक घंटे तक किसमिस को भीगा कर उसका सेवन करने से व्रत के दिन प्यास कम लगती है।

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हरितालिका (Teej) व्रत की पूजन सामग्री।

पञ्चमेवा, गुड़, जौ, तिल,हवन सामग्री, केले के खम्भे, दूध, सुहाग पिटारी, गंगाजल, दही, तरकी, चूड़ी, अक्षत, घी, बिछिया, माला, सफेद फूल, शक्कर, कंघी, गंगा मृतिका, शहद शीशा, चंदन, कलश, नारा डोरा, केसर, दीपक, सूरमा, 5 प्रकार के फल, पान, मिश्री, धूप, कपूर, सुपारी
4 नारियल, महावर, बिंदी, सम्पूर्ण वस्त्र, चौकी, सिंदूर, पकवान, यज्ञोपवीत, रोली, मिठाई, फुलहरा, मिट्टी के शिवलिंग, रुई, गौरी गणेश, हल्दी, चन्दन, दूर्वा, भांग, धतुरा,शमी का पत्ता, बेलपत्र, लौंगचंदन, कमलगट्टातीज प्रसाद।

जानिए तीज (Teej) पूजन की संपूर्ण विधि एवम् मन्त्र।

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हरितालिका अर्थात तीज (Teej) व्रत धारण करने वाली स्त्रियां, भादो महीने की शुक्ल पक्ष तृतीया के दिन ब्रह्म मुहूर्त में जागे नृत्य-कर्मों से निवृत्त होकर, उसके पश्चात तिल तथा आवलों के चूर्ण के साथ स्नान करें। फिर पवित्र स्थान में आटे से चौक पुरकर, केले का मंडप स्थापित करके, शिव पार्वती की पार्थिव प्रतिमा {मिट्टी की मूर्ति} बनाकर स्थापित करें। तत्पश्चात पवित्र वस्त्र धारण करके आसन पर पूर्व अभिमुख होकर बैठ कर देशकाल आदि के उच्चारण के साथ हाथ में जल लेकर संकल्प लें कि

~ मैं आज तीज (Teej) के दिन शिव-पार्वती का पूजन करूंगी। इसके अनंतर “श्री गणेशाय नमः” उच्चारण करते हुए श्री गणेश जी की पूजन करें। “कलशाभ्यो नमः” से वरुणादि देवों का आवाहन करके कलश पूजन करें। चंदन आदि समर्पण करें कलश मुद्रा दिखावे घंटा बजा में जिसे राक्षस भाग जाएं और देवा देवताओं का शुभागमन हो। गंधक आदि अक्षत आदि द्वारा घंटा को नमस्कार करें।

दीपक को नमस्कार कर पुष्पाक्षतादि से पूजन करें। हाथ में जल लेकर पूजन सामग्री तथा अपने ऊपर जल छिड़कें। इन्द्रादि अष्ट लोकपालों का आवाहन एवं पूजन सामग्री तथा अपने ऊपर जल छिड़कें। इसके बाद अर्घ्य, पाद्य, गंगा जल से आचमन करायें। शंकर, पार्वती को गंगाजल से दूध से मधु सिद्धि से घर से स्नान कराकर फिर शुद्ध जल से स्नान कराएं। इसके उपरांत हर एक वस्तु अर्पण के लिए ओम नमः शिवाय उच्चारण करते हुए पूजन करें।

अक्षत पुष्प धूप तथा दीपक दिखाने फिर नैवेद्य चढ़ाकर आचमन करायें।

अनंतर हाथों के लिए उबटन अर्पण करें। सुपारी अर्पण करें। दक्षिणा भेंट करें। अनंतर पुष्पमाला चढ़ावे, वह नमस्कार करें। इस प्रकार के पंचोपचार पूजन से श्री शिव हरितालिका की प्रसन्नता के लिए ही कथन करें। फिर उत्तर की ओर निर्माल्य का विसर्जन करें। श्री शिव हरितालिका की जय जयकार कर महा अभिषेक करें।

इसके बाद सुंदर वस्त्र समर्पण करें। यज्ञोपवीत धारण करावे। चंदन अर्पित करें। अक्षत चढ़ावे।सप्तधान्य समर्पण करें। हल्दी चढ़ावे। कुमुकम् मांगलिक सिंदूर वस्त्र आभूषण श्रृंगार आदि अर्पण करें। भोजपत्र कंठमाला आदि समर्पण करें। सुगंधित पुष्प अर्पण करें। धूप देवें। दीप दिखावे। निवेद्य चढ़ावे। फिर मध्य में जल से हाथ मुँख धुलाने के लिए जल छोड़ें और चंदन लगावे। नारियल तथा ऋतु फल अर्पण करें।

तांबूल सुपारी चढ़ावे। दक्षिणा द्रव्य चढ़ावे। भूषण आदि चढ़ावे। फिर दीप आरती उतारे। कपूर की आरती करें। पुष्पांजलि चढ़ावे। इसके बाद परिक्रमा करें। और ओम नमः शिवाय इस मंत्र से नमस्कार करें। फिर तीन अर्घ देवें। इसके बाद संकल्प द्वारा ब्राम्हण आचार्य का पवित्र वस्त्र आदि द्वारा पूजन करें। पूजा के पश्चात अन्न वस्त्र फल दक्षिणा युक्त पात्र हरितालिका का देवता के प्रसन्नार्थ ब्राह्मण को दान करें। उसमें न मम् कहना आवश्यक है, इससे देवता प्रसन्न होते हैं। दान लेने वाला संकल्प लेकर वस्तुओं के ग्रहण करने की स्वीकृति देवे, इसके बाद विसर्जन करें। विसर्जन में अक्षत और जल छिड़कें।

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अथ हरतालिका (Teej) व्रत कथा।

एक समय नैमिषारण्य तीर्थ में वेदों, पुराणों एवम् शास्त्रों के ज्ञाता अपने शिष्यों को वेदों पुराणों की शिक्षा दे रहे थे। सूत जी वहां पर उपस्थित साधु संतों एवं शिष्यों को हरितालिका व्रत की कथा सुना रहे थे। हरतालिका व्रत के विषय में सूत जी तीज की कथा प्रारभ से पूर्व माता पार्वती जी एवम् शिव जी की स्तुति करने लगे~ जिन श्री पार्वती जी के घुंघराले केश कल्पवृक्ष के फूलों से ढके हुए हैं और जो सुंदर एवं नए वस्त्रों को धारण करने वाली हैं। तथा कपालों की माला से जिनका मस्तक शोभायमान हैं और दिगंबर जटाधारी शंकर भगवान हैं, उनको नमस्कार हो।। अब सूत जी कथा प्रारभ करते हैं ~कैलाश पर्वत की सुंदर विशाल चोटी पर विराजमान शंकर भगवान से गौरी जी ने पूछा- हे प्रभु आप मुझे गुप्त से गुप्त किसी व्रत की कथा सुनाइए।

हे स्वामी यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो ऐसा व्रत बताने की कृपा करें,

जो सभी धर्मों का सार हो और जिसके करने में थोड़ा परिश्रम हो और फल भी विशेष प्राप्त हो जाए। यह भी बताने की कृपा करें कि मैं आपकी पत्नी किस व्रत के प्रभाव से हुई हूं। हे जगत के स्वामी आप आदि मध्य अंत से रहित हैं। आप मेरे पति किस दान अथवा पुण्य के प्रभाव से हुए हैं। शंकर जी बोले-हे देवी सुनो, मैं तुमसे वह उत्तम व्रत कहता हूं, जो परम गोपनीय एवं पूरा सर्वस्व है। वह व्रत जैसे कि तारों में चंद्रमा, ग्रहों में सूर्य, वर्णों में ब्राह्मण, सभी देवताओं में विष्णु, नदियों में जैसे गंगा, पुराणों में महाभारत, वेदों में सामवेद, इंद्रियों में मन जैसे श्रेष्ठ समझे जाते हैं।

वैसे ही पुराण एवं वेदों का सर्वस्व इस व्रत को शास्त्रों में कहा है, उसे एकाग्र मन से श्रवण करो। इस व्रत के प्रभाव से ही तुमने मेरा अर्ध आसन प्राप्त किया है। तुम मेरी परम्प्रिय हो। इसी कारण वह सारा व्रत मैं तुमसे सुनाता हूं। भादो का माह हो, शुक्ल पक्ष की तृतीया हो, हस्त नक्षत्र हो, उसी दिन इस व्रत के अनुष्ठान से मनुष्यों के सभी पाप भस्मभूत हो जाते हैं। हे देवी! सुनो जिस महाव्रत को तुमने हिमालय पर्वत पर धारण किया था, वह सब का सब पूरा वृतांत मुझसे श्रवण करो। श्री पार्वती जी बोली हे भगवान! वह सर्वोत्तम व्रत किस महीने, किस प्रकार किया था? यह सब हे महेश्वर! में आपसे सुनना चाहती हूं।

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शिवजी बोले हिमालय नामक एक उत्तम महान पर्वत है। नाना प्रकार की भूमि तथा वृक्षों से वह शोभायमान है अनेकों प्रकार की पशु पक्षी वहां अपनी मधुर बोलियों से उसे शोभायमान कर रहे हैं। एवं चित्र विचित्र मृगादिक पशु वहां पर चढ़ते हैं। देवता, गंधर्व, सिध्द चारण एवं गुह्यक। प्रसन्न होकर वहां घूमते हैं। गंधर्वजन गायन करने में मग्न रहते हैं। नाना प्रकार की मणियाँ तथा सोने की ऊंची ऊंची चोटियों, रूपी भुजाओं से आकाश पर लिखता हुआ दिखाई देता है। उसका आकाश से इस पर इस प्रकार से है जैसे कोई अपने मित्र के मंदिर को छू रहा हो। वह बर्फ से ढका रहता है।

गंगा नदी की ध्वनि से वह सदा शब्दायमान रहता है। हे पार्वती! तुमने वहीं बाल्यावस्था में 12 वर्ष पर्यंत कठोर तप किया। अधोमुख होकर केवल धुएं का सेवन किया।। फिर 64 वर्ष पर्यंत पके पके पत्ते खाए। माघ महीने में जल में खड़ी होकर तप किया और वैशाख में अग्नि का सेवन किया। सावन में अन्न पान का त्याग कर दिया। एकदम बाहर मैदान में जाकर तप किया। तुम्हारे पिताजी तुम्हें इस प्रकार के कष्टों में देखकर घोर चिंता से व्याकुल हो गए। उन्होंने विचार किया कि यह कन्या किसको दी जाए! उस समय ब्रह्मा जी के पुत्र परम धर्मात्मा श्रेष्ठ मुनि नारद जी तुम्हें देखने के लिए वहां आ गए। उन्हें अर्घ्य आसन देकर हिमालय ने उनसे कहा हे श्रेष्ठ मुनि! आप का आना शुभ होता है। बड़े भाग्य से ही आप जैसे ऋषियों का आगमन होता है।

कहिये आपका शुभ आगम मन किस कारण से हुआ?

श्री नारद मुनि बोले है पर्वतराज! सुनिए, मुझे स्वयं विष्णु भगवान ने आपके पास भेजा है।आपकी यह कन्या रत्न है। किसी योग्य व्यक्ति को समर्पण करना ही उत्तम है। संसार में ब्रह्मा इंद्र शंकर इत्यादि देवताओं में वासुदेव श्रेष्ठ माने जाते हैं। उन्हें ही अपनी कन्या देना उत्तम है।मेरी तो यही सम्मति है। हिमालय बोले! देवाधिदेव वासुदेव यदि स्वयं ही जब कन्या के लिए प्रार्थना कर रहे हैं और आपके आगमन का भी यही प्रायोजन है तो अपनी कन्या उन्हें दूंगा। यह सुनकर नारदजी वहां से अंतर्ध्यान होकर शंख चक्र गदा पद्म धारी श्री विष्णु जी के पास पहुंचे।

नारद जी बोले हे देव! आपका विवाह निश्चित हो गया है, इतना कहकर देवर्षि नारद तो चले आए। और इधर हिमालय राज ने अपनी पुत्री गौरी से प्रसन्न होकर कहा हे पुत्री! तुम्हें गरुड़ध्वज वासुदेव जी के प्रति देने का विचार कर लिया है। पिता के इस प्रकार के वचन सुनकर पार्वती अपनी सखी के घर गई और अत्यंत दुखी होकर पृथ्वी पर गिर पड़ी और विलाप करने लगी। उन्हें इस प्रकार दुखित हो विलाप करते हुए देख कर सकी ने देखा तो पूछने लगी। हे देवी! तुम्हे क्या दुख हुआ है मुझसे कहो और तुम्हें जिस प्रकार से भी सुख हो मैं निश्चय ही वही उपाय करूंगी।

पार्वती जी बोली, सखी मुझे प्रसन्न करना चाहती हो तो मेरी अभिलाषा सुनो हे सखी! मैं कुछ और चाहती हूं मेरे पिता कुछ और करना चाहते हैं। मैं तो अपना पति श्री महादेव जी को वर चूकी हूं। मेरे पिता इसके विपरीत मेरा विवाह करना चाहते हैं। इसीलिए है प्यारी सखी मैं अब अपनी इस देह का त्याग कर दूंगी। तब पार्वती के ऐसे वचन सुनो सखी ने कहा पार्वती तुम घबराओ नहीं, हम दोनों यहां से निकलकर घोर वन में पहुंच जाएंगे। जिसे तुम्हारे पिता जान ही नहीं सकेंगे।

 

तीज पूजन

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इस प्रकार आपस में राय करके श्री पार्वती जी को वह घोर वन में ले गई। तब पिता हिमालय राज ने अपनी पुत्री को घर में ना देख कर इधर-उधर खोज किया। घर-घर ढूंढा किंतु वह ना मिली, तो विचार करने लगे, मेरी पुत्री को देवताओं के नामों में से कौन ले गया? मैंने नारद के आगे विष्णु जी के प्रति कन्या देने की प्रतिज्ञा की थी, अब मैं क्या दूंगा? इस प्रकार की चिंता करते-करते मूर्छित होकर गिर पड़े। तब उनकी ऐसी अवस्था सुनकर हाहाकार करते हुए लोग हिमालय राज के पास पहुंचे, और मूर्छा का कारण पूछने लगे। हिमालय भोले की किसी दुष्ट आत्मा ने मेरी कन्या का अपहरण कर लिया है।

अथवा किसी काल सर्प ने उसे काट लिया है या किसी सिंह बाघ ने उसे मार डाला है। पता नहीं मेरी कन्या कहां चली गई? किस दुष्ट ने उसे हर लिया? ऐसा कहते-कहते शौक से असंतप्त होकर हिमालय राज वायु से कम्पायमान महा वृक्ष के समान कांपने लगे। तुम्हारे पिता ने सिंह, बाघ, भालू, हाथी, हिंसक पशुओं से भरे हुए एक वन से दूसरे वन में जा जाकर तुम्हें ढूंढने का बहुत अत्यंत प्रयास किया। इधर अपनी सखियों के साथ एक घोर वन में तुम भी जा पहुंचे।

वहां एक सुंदर नदी बह रही थी। उसके तट पर बड़ी गुफा थी।

जिसे तुमने देखा तब अपनी सखियों के साथ तुमने उस गुफा में प्रवेश किया।  खाना-पीना त्याग करके वहां तुमने मेरी पार्वती युक्त बालू का लिंग स्थापित किया। उस दिन भादो मास की तृतीया थी साथ में हस्त नक्षत्र था। मेरी अर्चना पूजा तुम ने बड़े प्रेम से आरंभ की बाजों तथा गीतों के साथ रात को जागरण भी किया। इस प्रकार तुम्हारा परम श्रेष्ठ व्रत हुआ। उसी व्रत के प्रभाव से मेरा आसन हिल गया। तब तत्काल ही मैं प्रकट हो गया। जहां तुम सखियों के साथ ही मैंने दर्शन देकर कहा कि हे वरानने वर मांगो। तब तुम बोली है देव महेश्वर यदि आप प्रसन्न हो तो मेरे स्वामी बनिए।

तब मैंने तथास्तु कहा फिर वहां से अंतर्ध्यान होकर कैलाश पर्वत पर पहुंचा। इधर जब प्रातः काल हुआ तब तुमने मेरे मेरी लिंग मूर्ति का नदी में विसर्जन किया। अपनी सखियों के साथ वन में प्राप्त कंद-मूल फल आदि से तुमने पारण किया। हे सुंदरी! उस स्थान पर सखियों के साथ तुम सो गई। हिमालय राज तुम्हारे पिता भी उस घर में आ पहुंचे। अपना खाना पीना पीना छोड़कर तुम्हे चारों और तुम्हें ढूंढने लगे। नदी के किनारे दो कन्याओं को सोता हुआ उन्होंने देख लिया और पहचान लिया।

फिर तुम्हें उठाकर गोदी में लेकर तुमसे कहने लगे हे पुत्री! सिंह व्याघ आदि पशुओं से पूर्ण वन में तुम क्यों आई? तब श्री पार्वती जी बोली पिता जी सुनिए आप मुझे विष्णु को देना चाहते हैं थे। आपकी यह बात मुझे अच्छी नहीं लगी। इससे मैं वन में चली आई यदि आप मेरा विवाह शंकर के साथ करें तो मैं घर नहीं चलूंगी यहीं रहने का मैंने निश्चय कर लिया है। तब तुम्हारे पिता ने कहा एवअस्तु मैं शंकर के साथ ही तुम्हारा विवाह करूंगा।

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 तीज पूजन की महत्व,इतिहास,संपूर्ण विधि एवम् मन्त्र। 

उनके ऐसा कहने पर ही तब तुम घर में आए तुम्हारे पिताजी ने तब विवाह विधि से तुम को मुझे समर्पित कर दिया। हे पार्वती जी! उसी व्रत का प्रभाव है जिसे तुम्हारे सौभाग्य की वृद्धि हो गई। अभी तक किसी के सम्मुख मैंने व्रतराज का वर्णन नहीं किया। हे देवी! इस व्रत राज का नाम भी अब श्रवण कीजिए क्योंकि तुम अपनी सखियों के साथ इस व्रत के प्रभाव से हरी गई। इस कारण इस व्रत का नाम हरितालिका हुआ। पार्वती जी बोली हे प्रभु आपने इसका नाम तो कहा, कृपा करके इसकी विधि भी कहिए।

इसके करने से कौन सा फल मिलता है? कौन सा पुण्य लाभ होता है? और किस प्रकार से कौन इस व्रत को करें? महादेव जी बोले हे देवी! सुनो यह व्रत सौभाग्य वर्धक है, इसको सौभाग्य की इच्छा हो वह यत्न पूर्वक इस व्रत को करें। सबसे प्रथम वेदी की रचना करें। उसमें चार केले से खम्भ रोपित करें, चारों ओर चारों ओर बंदनवार बाँधे, ऊपर वस्त्र बांधे। विविध रंगों के और भी वस्त्र लगा, मंडप के नीचे की भूमि को अनेकों चंदन आदि सुगंधित जल द्वारा चढ़ाये। शंख मृदंग आदि बाजी बजाएं वह मंडप मेरा मंदिर है, इसलिए नाना प्रकार के मंगल गीत वहां होने चाहिए। शुद्ध रेती का मेरा लिंग श्री पार्वती जी के साथ ही वहां स्थापित करें।

बहुत से पुष्पों के द्वारा गंध धूप आदि से मेरा पूजन करें। फिर नाना प्रकार के मिष्ठान आदि और निवेद समर्पित करें एवं रात को जागरण करें। नारियल सुपारी मुसम्मी या नीबू बीजपुर नौरंगिया एवं और भी ऋतु अनुसार फल, उस ऋतु में होने वाले नाना प्रकार के कंदमूल सुगंधित धूप दीप आदि सब लेकर इन मंत्रों द्वारा पूजन करके चढ़ावे।

मंत्र यह है – (Teej)

शिव शांत पंचमुखी सूली नंदी रंगी भृङ्गी, महाकाल गणों से युक्त शंभू आपको नमस्कार है।

शिवा शिव प्रिया प्रकृति सृष्टि हेतु श्री पार्वती जी सर्वमंगला रूपा रूपा जगद रूपा आपको नमस्कार है

हे देवी नित्य कल्याण कारिणी जगदंबिके शिवस्वरूप ए आपको बारंबार नमस्कार है।

आप ब्रह्मचारिणी हो जगत की धात्री सिंह वाहिनी हो आपको नमस्कार है।

संसार के भय सन्ताप से मेरी रक्षा कीजिए। हे महेश्वरी पार्वती जी! जिस कामना के लिए आपकी पूजा की है हमारी वह कामना पूर्ण करें। राज्य सौभाग्य एवं संपत्ति प्रदान करें।

शंकर जी बोले हे देवी इन मंत्रों तथा प्रार्थना ओं द्वारा मेरे साथ तुम्हारी पूजा करें। और विधिपूर्वक कथा श्रवण करें, फिर बहुत सा अन्नदान करें यथाशक्ति वस्त्र, स्वर्ण, गाय, ब्राह्मणों को दें एवं अन्य ब्राह्मणों को भूयसी दक्षिणा दें। स्त्रियों को भूषण आदि प्रदान करें। पंडितों को यथा शक्ति दक्षिणा प्रदान करें। हे देवी! जो स्त्री अपने पति के साथ भक्तचित्त से सर्वश्रेष्ठ व्रत को सुनती तथा करती है, उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। सात जन्मो तक उसे राज्य की प्राप्ति होती है। सौभाग्य की वृद्धि होती है।

और जो नारी भादो के शुक्ल पक्ष की तृतीया के दिन व्रत नहीं धारण करती आहार कर लेती है। वह सात जन्मों तक बंध्या रहती है,

एवं जन्म जन्म में विधवा हो जाती है। दरिद्रता पाकर अनेकों कष्ट उठाती है। उसे पुत्र शोक छोड़ता ही नहीं और जो उपवास नहीं करती वह घोर नरक में पडती है। अन्न के आहार करने से उसे शुकरी का जन्म मिलता है। फल खाने से बानरी होती है। जल पीने से जोक होती है।

दूध के आहार से सर्पनी होती है। मांसाहार से बाघिनी होती है। दही के सेवन से बिल्ली होती है। मिठाई खा लेने पर चींटी होती है। सभी वस्तुएं खा लेने पर मक्खी हो जाती है। सो जाने पर अजगरी का जन्म पाती है। पति के साथ ठगी करने पर मुर्गी होती है। शिवजी भोले इस कारण सभी स्त्रियों को प्रयत्न पूर्वक सदा यह व्रत करना चाहिए। सोने तांबे एवं बांस से बने अथवा मिट्टी के पात्र में अन्य रखें फिर फल वस्त्र दक्षिणा आदि यह सब श्रद्धा पूर्वक विद्वान श्रेष्ठ ब्राह्मण को दान करें।

उनके अनंतर पारण अर्थात भोजन करें। हे देवी! जो स्त्री इस प्रकार सदाव्रत किया करती है। वह तुम्हारे समान ही अपने पति के साथ इस पृथ्वी पर अनेक लोगों को प्राप्त करके आनंद विहार करती है। और अंत में शिव का सानिध्य प्राप्त करती है। इस कथा के श्रवण करने से हजार अश्वमेध एवं 1000 वाजपेय यज्ञ का फल प्राप्त होता है। श्री शिव जी बोले हे देवी! इस प्रकार मैंने आपको इस सर्वश्रेष्ठ व्रत का महत्व सुनाया है जिसके अनुष्ठान मात्र से करोड़ों यज्ञ का पूर्ण फल प्राप्त होता है।

इतिश्री श्री भविष्य उत्तर पुराने हर गौरी संवाद ए हरितालिका व्रत कथा समाप्त।

 तीज पूजन की महत्व,इतिहास,संपूर्ण विधि एवम् मन्त्र। 

।।🕉शिव पंचाक्षर स्त्रोतम्🕉।।
{Shiv Panchakshar Strotam}

नागेंद्रहाराय त्रिलोचनाय भस्मांगरागाय महेश्वराय।
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय तस्मै “न” काराय नमः शिवाय॥

मंदाकिनी सलिल चंदन चर्चिताय नंदीश्वर प्रमथनाथ महेश्वराय।
मंदारपुष्प बहुपुष्प सुपूजिताय तस्मै “म” काराय नमः शिवाय॥

शिवाय गौरी वदनाब्जवृंद सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय।
श्री नीलकण्ठाय वृषध्वजाय तस्मै “शि” काराय नमः शिवाय॥

वसिष्ठ कुम्भोद्भव गौतमार्य मुनींद्र देवार्चित शेखराय।
चंद्रार्क वैश्वानर लोचनाय तस्मै “व” काराय नमः शिवाय॥

यक्षस्वरूपाय जटाधराय पिनाकहस्ताय सनातनाय।
दिव्याय देवाय दिगम्बराय तस्मै “य” काराय नमः शिवाय॥

पंचाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेत् शिव सन्निधौ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते॥

नोट :- हरितालिका व्रत कथा श्रवण के बाद हवन करना चाहिए

हवन पूर्ण होने के बाद शिवजी की आरती करें।
Om jai Shiv Omkara

जय शिव ओंकारा ॐ जय शिव ओंकारा ।
ब्रह्मा विष्णु सदा शिव अर्द्धांगी धारा ॥ ॐ जय शिव…॥

एकानन चतुरानन पंचानन राजे ।
हंसानन गरुड़ासन वृषवाहन साजे ॥ ॐ जय शिव…॥

दो भुज चार चतुर्भुज दस भुज अति सोहे।
त्रिगुण रूपनिरखता त्रिभुवन जन मोहे ॥ ॐ जय शिव…॥

अक्षमाला बनमाला रुण्डमाला धारी ।
चंदन मृगमद सोहै भाले शशिधारी ॥ ॐ जय शिव…॥

श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे ।
सनकादिक गरुणादिक भूतादिक संगे ॥ ॐ जय शिव…॥

कर के मध्य कमंडलु चक्र त्रिशूल धर्ता ।
जगकर्ता जगभर्ता जगसंहारकर्ता ॥ ॐ जय शिव…॥

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका ।
प्रणवाक्षर मध्ये ये तीनों एका ॥ ॐ जय शिव…॥

काशी में विश्वनाथ विराजत नन्दी ब्रह्मचारी ।
नित उठि भोग लगावत महिमा अति भारी ॥ ॐ जय शिव…॥

त्रिगुण शिवजीकी आरती जो कोई नर गावे ।
कहत शिवानन्द स्वामी मनवांछित फल पावे ॥ ॐ जय शिव…॥

।। शिवजी की स्तुति।।

हे दीन बंधु दयालु शंकर जानी जन अपनाइये।
भव धार पार उतार मोकों निजी समीप बसाइये।।

जाने अजाने पाप मेरे आप तिनहिं नसाइये।
कर जोरि जोरि निहोरि मांगौं बेगि दरश दिखाइये।।

देवी सहाय सुनाए शिव को प्रेम सहित जो गावहिं।
जग योनि से छूटि जांय ते नर सदा अति सुख पावहीं।।

।। दोहा।।

बार-बार बिनती करौं धरौं चरण पर माथा।
निज पद भक्ति भाव मोहि देहु उमापति नाथ।।

शिव समान दाता नहीं विपति विदारण हार।
लज्जा मेरी राखियो बरधा के असवार।।

🕉शिव वंदना🕉

ॐ वन्दे देव उमापतिं सुरगुरुं, वन्दे जगत्कारणम् ।
वन्दे पन्नगभूषणं मृगधरं, वन्दे पशूनां पतिम् ।
ॐ वन्दे सूर्य शशांक वह्नि नयनं, वन्दे मुकुन्दप्रियम् ।
वन्दे भक्त जनाश्रयं च वरदं, वन्दे शिवंशंकरम् ।

संकल्प :

Teej

(दाहिने हाथ में जल अक्षत और द्रव्य लेकर निम्न संकल्प मंत्र बोले 🙂

ऊँ विष्णु र्विष्णुर्विष्णु : श्रीमद् भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्त्तमानस्य अद्य श्री ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीय परार्धे श्री श्वेत वाराह कल्पै वैवस्वत मन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे युगे कलियुगे कलि प्रथमचरणे भूर्लोके जम्बूद्वीपे भारत वर्षे भरत खंडे आर्यावर्तान्तर्गतैकदेशे —— नगरे —*— ग्रामे वा बौद्धावतारे ……नाम संवत्सरे श्री सूर्ये…..’ …. ऋतौ महामाँगल्यप्रद मासोत्तमे शुभ….. मासे…. पक्षे ….. तिथौ ….वासरे …. नक्षत्रे … योगे…. करणे… राशि …. चन्द्रे …. राशि ….सूर्य …राशि स्थिते देवगुरौ शेषेषु ग्रहेषु च यथा यथा राशि स्थान स्थितेषु सत्सु एवं ग्रह गुणगण विशेषण विशिष्टायाँ चतुर्थ्याम्‌ शुभ पुण्य तिथौ — +– गौत्रः –++– अमुक शर्मा, वर्मा, गुप्ता, दासो ऽहं मम आत्मनः नामाहं हरितालिका व्रत निमित्ते नवसृजन ईश्वरी योजनाम् अनुसरन् आत्मनिर्माण-परिवारनिर्माण-समाजनिर्माणादिषु त्रिविध साधनासु नियम निष्ठा पूर्वकम् सहयोग प्रदानाय संकल्पम् अहम् करिष्ये।

क्षमा प्रार्थना मंत्र पढ़ें।-(Teej)

आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्‌ ॥

पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वरि ॥

मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वरि ।

पापोऽहं पापकर्माहं पापात्मा पापसम्भवः ।

त्राहि माम्‌ परमेशानि सर्वपापहरा भव ॥

अपराधसहस्राणि क्रियन्तेऽहर्निशं मया ।

दासोऽयमिति मां मत्वा क्षमस्व परमेश्वरि ॥

यत्पूजितं मया देवि परिपूर्ण तदस्तु मे ॥

!! इति श्री हरितालिका व्रत पूजनम् संपूर्णम्!!

हरितालिका (Teej) पूजन एवं अन्य व्रतों एवम् त्योहारों से संबंधित कोई प्रश्न, कई भ्रांतियां उत्पन्न हो, या कोई अन्य सलाह लेना हो तो। आप हमारे ज्योतिषाचार्य पंडित अभिनव पांडेय जी से 7999314964 पर संपर्क कर सकते हैं। वे उचित सन्मार्ग प्रदान करेंगे।

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